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काव्य पाठ शक्ति

हलचल

काव्य पाठ 'शक्ति' में महिलाओं के ओज की किरणें बिखरीं... 

अमर उजाला काव्य डेस्क, नई दिल्ली

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महिला दिवस पर अमर उजाला काव्य की ओर से गुरुवार को काव्य पाठ 'शक्ति' का आयोजन किया गया। समारोह में दिल्ली-एनसीआर की युवा कवियित्रियों ने शिरकत कर महिला ओज की किरणें बिखेरीं। अपनी कलम से समाज में महिलाओं के जीवन की सच्चाई का शिद्दत से वर्णन कर रहीं शिवा, दामिनी यादव, अनुपम सिंह, संजना झा ने क्रांतिकारी रचनाओं का सस्वर पाठ कर समारोह को रोमांचित कर दिया। 

महिला युवा रचनकारों ने साफ-साफ कहा कि अब हमें अबला कहना छोड़ दो। हम अबला नहीं है। हम विश्वास और साहस से भरपूर एक पुंज पताका हैं। जिसका शौर्य एक न एक दिन अवश्य फहराएगा। शिवा ने महिलाओं के जीवन पर बंदिशों को इंगित करते हुए हक और अधिकार की बात कही। वहीं महिलाओं के जीवन में परेशानियों से कैसे निपटा जाए इस पर उन्होंने अपनी कविता में खासा ध्यान भी आकर्षित किया।

शिवा की कविता ने समारोह में महिलाओं के संघर्ष और जीवन की जीवंत तस्वीर पेश की...

'स' से स्त्री

अजंता की नक्काशी
ताजमहल के मध्य सोई क़ब्र
झरनों के उपमान
चाँद की खीझ
राजवंषों की नींव में लगी दीमक
कृष्ण की बाँसुरी का वादी सुर
कवियों की वैचारिक शून्यता
राम का अपराधबोध
विश्वामित्र की ग्लानि
वैज्ञानिकों की टूटी दूरबीन
लाज की सबसे विस्तृत परिभाषा
स्नेह का आधा 'स' 
और पुरुष का अहं
कुछ भी अस्तित्व में ना होता
अगर स्त्री की देह कोई आम देह होती

स्त्री की देह वह खंडहर है 
जिसमें टूटती सभ्यताएं अपनी तमाम नाकामयाबियाँ छुपा
इत्मीनान से इतिहास की किसी किताब में सो सकती हैं 

स्त्री की देह में एक मंदिर का निर्माण 
समाज के पापों के शुद्धिकरण का रास्ता है 

स्त्री की देह में पुरुष का दखल
क्रांति का मार्ग प्रशस्त होना है 

स्त्री, एक चित्रकार जो अपनी देह 
को एक नक्शे में बांधती है 
फिर उस नक्शे को मिटाती है 
फिर एक नया नक्शा खींचती है
और यह क्रिया निरंतर करती रहती है, आजीवन

शिवा ने अपनी 'लड़की' कविता भी पढ़ी, जिसमें एहसास को बड़ी बारीकी से उतारा गया था।  

माँ के शरीर से पृथक होते ही 
पृथक हो जाते हैं उसकी देह और अस्तित्व
एक सभा बैठती है 
कुछ आवाज़ें उठती हैं 
कुछ मातम भी मनते हैं
तय किये जाते हैं उसके चलने, देखने, बोलने के तरीके 
जीने के सलीके 

पाओं पर खड़ी ही होती है 
ज़रा बड़ी ही होती है 
कि सुनाई जाती हैं सिंड्रेला, स्नो वाइट की कहानियां 
जिनकी ज़िन्दगनियाँ 
तय करते हैं घोड़े पे आते राजकुमार, सौतेली माएं, भाई-बहन 
पकड़ाए जाते हैं गुड्डे 
जिनकी देखभाल उसके जीवन का अंतिम लक्ष्य होना है 

थोड़ी सयानी होती है 
तो घर की इज़्ज़त उसके शरीर में छिपा 
नए नए बहाने बना 
खिंचती हैं लक्षमण रेखाएं 
सरकाए जाते हैं कंधे पे दुपट्टे 
खींच ली जाती है गले से आवाज़ 

जवानी की दहलीज़ लांघते ही
थोड़ा और फिसल जाता है 
उसके हाथ से अपना ही अस्तित्व 
थोड़ा और गिर जाता है 
उसकी इच्छाओं का मोल
अपनी देह को छूना, उसका दोष
किसी को छूने देना, उसका दोष 
किसी का जबरन छू लेना, उसका दोष 
इस संपत्ति पर से पिता की नेमप्लेट हटने 
और पति की लगने तक 
उसे संजोए रखना है अपनी नींव, सीमाओं, व दीवारों को 
उसे प्रश्न पूछने का अधिकार नहीं 
पर उत्तर अपरिचितों को भी देने हैं 
उसे छिपाना है अपने शरीर से निकलता लहू 
अपने मन से रिसता गुस्सा 
और अपने मस्तिष्क की उड़ने की ख्वाहिश 

नियम तय करता समाज
भूल जाता है कि
औरत का भूगोल हो जाना 
प्रलय की प्रस्तावना हो सकता है 
औरत का बांध हो जाना 
बाढ़ की संभावना हो सकता है 
औरत का सम्पदा हो जाना
औरत का मूक हो जाना 
जीवन के अंत समान है 
यह भारी चूक हो जाना 
कि उसका देह और अस्तित्व एक ही मिट्टी के बने हैं 
और इस मिट्टी को किस सांचे में ढाला जाए 
इसका निर्णय केवल उसका है । 
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