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ख़ूबसूरत 'शाम' पर ये 10 चुनिंदा शेर...

काव्य चर्चा

ख़ूबसूरत 'शाम' पर ये 10 चुनिंदा शेर...

अमर उजाला, काव्य डेस्क, नई दिल्ली

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शाम तक सुब्ह की नज़रों से उतर जाते हैं 
इतने समझौतों पे जीते हैं कि मर जाते हैं 
- वसीम बरेलवी

अब कौन मुंतज़िर है हमारे लिए वहाँ 
शाम आ गई है लौट के घर जाएँ हम तो क्या 
- मुनीर नियाज़ी आगे पढ़ें

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