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maa tujhe pranam kavi sammelan and mushaira

हलचल

'मां तुझे प्रणाम' में कवि सम्मेलन- मुशायरा हुआ सम्पन्न

अमर उजाला काव्य डेस्क, नई दिल्ली

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अमर उजाला का अभिनव अभियान ‘मां तुझे प्रमाण’ के तहत शुक्रवार को कवि सम्मेलन- मुशायरा आयोजित किया गया, इस कार्यक्रम में नामचीन रचनाकारों और शायरों की महफ़िल सजी। वीर-रस की कविताओं ने जश्न-ए-आज़ादी की तैयारी में नया जोश भरा तो समसामयिक मुद्दों पर समाज को रास्ता दिखाया।

‘रोशनी का कुछ न कुछ इमकान होना चाहिए
बंद कमरे में भी रोशनदान होना चाहिए
वो जो अनपढ़ हैं चलो हैवान हैं तो ठीक हैं
हम पढ़े लिखों को तो इंसान होना चाहिए
हिंदू मुस्लिम चाहे जो लिखा हो माथे पर मगर
आपके सीने पर हिंदुस्तान होना चाहिए।’

शायर डॉ. नवाज देवबंदी ने जब ये शेर पढ़ा तो गोरखपुर विश्वविद्यालय का दीक्षा भवन ऑडिटोरियम मां भारती के जयघोष से गूंज उठा। कवि सम्मेलन की सदारत करते हुए उन्होंने अपने शेरों से नई पीढ़ी को संदेश दिया तो वहीं लोगों के दिल में तमाम एहसासों का इंद्रधनुष बना गए। कवि सम्मेलन की औपचारिक शुरुआत कवयित्री रश्मि शाक्य ने सरस्वती वंदना से की। इसके बाद संचालन करते हुए कवि दिनेश बावरा ने सबसे पहले व्यंग्यकार वीरआर विप्लवी को आवाज दी।

‘परिंदे चुग गए सब खेत कुछ बाकी नहीं है
खड़ा है मुल्क खाली पेट कुछ बाकी नहीं है’
सुनाकर वीआर विप्लवी ने लोगों की खूब दाद लूटी।

ये कौन हवाओं में जहर घोल रहा है
सब जानते हैं कोई नहीं बोल रहा है’
शेर से वीआर विप्लवी ने व्यंग्य किया तो पूरा हाल तालियों से गूंज उठा।

इसके बाद माइक पर आईं रश्मि शाक्य। उनके प्रेम गीतों पर पूरा हाल झूम उठा। उन्होंने जब ‘चमन में खिल उठे हैं फूल तुमने मुस्कुराया क्या/ कहीं तुमने प्रणय का गीत कोई गुनगुनाया क्या...’ गीत पढ़ा तो देर तक हाल में तालियों की गड़गड़ाहट सुनाई देती रही। 

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