आपका शहर Close
Hindi News ›   Kavya ›   Halchal ›   Fursat ke pal

हलचल

फुर्सत के पल

ललित चौधरी

3 कविताएं

942 Views
ढूंढता हूं मैं फुर्सत के पल
दौड़ती-भागती सी जिंदगी
जाने क्यों मची है हलचल
शायद कहीं तो मिल जाए इनका हल
यह जिंदगी तो बीत ही जानी है
आज नहीं तो कल
ढूंढता हूं मैं फुर्सत के पल

कोई भाग रहा है पैसे के पीछे
कोई जा पहुंचा है शिखर पर
ना जाने कितनों को रौंदकर पैरों के नीचे
क्यों इंसान बना जा रहा है इंसान का दुश्मन
कोई कीमत नहीं जिंदगी की यहां पर
मरते हुए को भी देखकर पलट जाते हैं लोग
सब ने मचा रखी है चला चल

बरस रही है आफत धरा पर
पीने को पानी नहीं मिलता सूखे पड़े हैं नल
कोई खुशामद में मशरूफ है कोई सरहद पर शहीद कोई बेचता अपना जमीर
लोग बनते उसी के मुरीद कोई भर रहा इस गुलिस्तानं में जहर

कहीं मर रहा किसान गरीबों पर टूटता कहर
कोई करता पुण्य तो कोई पाप में गया गल
उलझी पड़ी है जिंदगी जिसमें
ढूंढता हूं मैं फुर्सत के पल


हमें विश्वास है कि हमारे पाठक स्वरचित रचनाएं ही इस कॉलम के तहत प्रकाशित होने के लिए भेजते हैं। हमारे इस सम्मानित पाठक का भी दावा है कि यह रचना स्वरचित है। 

आपकी रचनात्मकता को अमर उजाला काव्य देगा नया मुक़ाम, रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
सर्वाधिक पढ़े गए
Top

Other Properties:

Disclaimer

अपनी वेबसाइट पर हम डाटा संग्रह टूल्स, जैसे की कुकीज के माध्यम से आपकी जानकारी एकत्र करते हैं ताकि आपको बेहतर अनुभव प्रदान कर सकें, वेबसाइट के ट्रैफिक का विश्लेषण कर सकें, कॉन्टेंट व्यक्तिगत तरीके से पेश कर सकें और हमारे पार्टनर्स, जैसे की Google, और सोशल मीडिया साइट्स, जैसे की Facebook, के साथ लक्षित विज्ञापन पेश करने के लिए उपयोग कर सकें। साथ ही, अगर आप साइन-अप करते हैं, तो हम आपका ईमेल पता, फोन नंबर और अन्य विवरण पूरी तरह सुरक्षित तरीके से स्टोर करते हैं। आप कुकीज नीति पृष्ठ से अपनी कुकीज हटा सकते है और रजिस्टर्ड यूजर अपने प्रोफाइल पेज से अपना व्यक्तिगत डाटा हटा या एक्सपोर्ट कर सकते हैं। हमारी Cookies Policy, Privacy Policy और Terms & Conditions के बारे में पढ़ें और अपनी सहमति देने के लिए Agree पर क्लिक करें।

Agree
Your Story has been saved!