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गोपालदास 'नीरज'

हाइकु

गोपाल दास नीरज- हे स्वर्ण केशी भूल न यौवन है…

अमर उजाला काव्य डेस्क, नई दिल्ली

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जन्म मरण 
समय की गति के 
हैं दो चरण 

वो हैं अकेले 
दूर खडे होकर 
देखें जो मेले 

मेरी जवानी 
कटे हुये पंखों की 
एक निशानी 

हे स्वर्ण केशी 
भूल न यौवन है 
पंछी विदेशी 

वो है अपने 
देखें हो मैने जैसे 
झूठे सपने

किससे कहें 
सब के सब दुख 
खुद ही सहें 

हे अनजानी 
जीवन की कहानी 
किसने जानी
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