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Return pf the infidel book review in hindi

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रिटर्न ऑफ द इन्फिडेल: धीरे-धीरे सरकते हुए संसार की कहानी

- ज्योतिर्मय

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सभ्यताओं और देशों के उत्थान-पतन की कहानी कहती हुई ‘रिटर्न ऑफ द इन्फिडेल’ कुछ मायनों में उनके भविष्य को भी आंकती है। इन मुद्दों पर तर्क और तथ्य के साथ कई सवाल करती और तथ्यों के आधार पर उनके जवाब तलाशती है। ये सवाल और जवाब किसी के गले उतर भी सकते हैं और ऐसे लोग भी होंगे जो उन्हें सिरे से नकारते होंगे। लेकिन सवाल हैं और कायम रहेंगे, क्योंकि उनके उत्तर पर मतभेद रहेंगे। उन मतभेदों से भी भविष्य को समझने में मदद मिलती है। उदाहरण के लिए सवाल है कि ईसाइयत के कारण दुनिया में सेवा परोपकार की भावना फैली या इन भावनाओं के पीछे पीछे साम्राज्यवाद अथवा इस्लाम के साथ भाईचारा आया या विस्तार और वर्चस्व समय के साथ मनुष्य की प्रवृत्तियां कैसे बदलती है, इस संबध में लेखक ने इतिहास को रेखांकित किया है। भारत के इतिहास पर सन 1954 के आसपास आर्थर लेवेलिन बाशम की एक पुस्तक आई थी, ‘द वंडर दैट वाज इंडिया’। पुस्तक का सार यह था कि करीब डेढ़ हजार साल से शकों, हूणों, तुर्कों, अरबों, सामान्य लुटेरो, पुर्तगालियों, फ्रांसीसियों और अंग्रेजों आदि के हाथों लुटते पिटते और शासित होते आए भारत का भविष्य क्या होगा? पुस्तक में इस्लाम के आने से पहले वाले भारत को समझने की कोशिश चल रही थी। उसी तरह ग्रीस, रोम, मिस्र और बेबिलोन का अध्ययन करते हुए विभिन्न निष्कर्ष भी सामने आ रहे थे। उन निष्कर्षों का सारतत्व यह था कि दुनिया से उपनिवेशवाद विदा हो रहा है। पूर्वी एशिया में पश्चिमी देशों और पश्चिम के साम्राज्य ढह रहे हैं। जिन तीन बड़े धर्मों – यहूदी, ईसाइयत और इस्लाम से निकली धाराओं ने पुरानी सभ्यताओं को फिर से खड़ा होने का आधार रचा था, वे मजबूत हो रहीं थी। कुल मिलाकर दुनिया नए सिरे से वापस अपने खोए हुए संसार की ओर लौट रही थी। इतिहास का अध्ययन करते हुए तथ्य यह भी उभर कर आता है कि समाज अपने युवाओं को वापस लाते और संगठित करते हैं। यह संगठन उनका उद्धार या भला करने के लिए होता है या राज्य की शक्ति बढ़ाने के लिए? संगठन या शक्ति ज्यादा मायने नहींं रखता है, तो इस मशक्कत का क्या लाभ? लेखक का कहना है कि यह कोशिश एक हद तक किसी संघर्ष और व्यवसाय की तरह ह,ै जो बेशुमार धन-दौलत कमाता या अर्जित करता और नई तकनीक आयात करता है। व्यवसाय की तरह समाज भी स्थिर और निष्क्रिय हो जाते हैं। इस कारण उन्हें चलाने के लिए विदेशी पूंजी और नियोजकों को आमंत्रित करने के लिए मजबूर होना पड़ता है।

इन्फिडेल की वापसी डार्विनवाद के साथ मिश्रित वैश्विक इतिहास के हिस्से के रूप में भारत, चीन और जापान में व्यापक-ऐतिहासिक प्रक्रिया का एक जैविक पुनरावृत्ति है। जब ये सभ्यताएं स्वर्ण युग में शिखर पर थीं,तो ईसाई और इस्लाम धर्मों में ढेर सारे युवक वापस आए।

लेखक ने इस संदर्भ में महात्मा गांधी को भारत विभाजन के लिए जिम्मेदार तक ठहराया है। घटनाओं को विस्तार देते हुए महात्मा गांधी के इस डर को उकेरा है कि विभाजन नहींं होता तो गांधीजी मानते थे कि उस स्थिति में 2050 तक भारत में हिंदू अल्पसंख्यक हो जाते। अविभाजित भारत में मुसलमामों की संख्या 75 करोड़ होती और स्वाभाविक ही वे बहुसंख्यक होते। भारत सबसे बड़ा मुस्लिम देश होता। चूंकि भारत के साथ और भी कई एशियाई देश अपनी अस्मिता को खोज रहे थे, भारत के सामने कई बड़ी चुनौतियां थी, उत्प्रेरक होने के कारण उसे 1947 तक सबसे कठिन संघर्ष करना पड़ा, किताब इस गाथा को अधिक विस्तार से बताती है।

कुल मिलाकार धर्म और समाज के ताने-बाने के बीच राजनीति की पड़ताल करती यह किताब कई तरह के सवाल पैदा करती है।

किताब -रिटर्न ऑफ द इन्फिडेल
लेखक - वीरेंद्र पंडित
प्रकाशक - वितास्ता पब्लिशिंग प्राइवेट लिमिटेड, नई दिल्ली
मूल्य - 695 रुपये

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