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इस हफ्ते की किताब

प्रदीप शुक्ल की कह मुकरियां... कभी कहते हो, कभी मुकरते हो !

मनोरंजन डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली

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पत्रिका मंतव्य की ओर से प्रदीप शुक्ल की मुकरियां एक विशेष प्रस्तुति के तहत बड़े ही आकर्षक अंदाज में छप कर आई है। कह-मुकरी लोक काव्य की रसपूर्ण और मनोरंजक विधा है, जिसका अर्थ उसमें ही छिपा है यानी कहकर मुकर जाना। इसकी शुरुआत अमीर खुसरो और भारतेंदु जैसे महान कवियों ने की थी, जिसे आधुनिक युग में भी कई कवियों ने आगे बढ़ाया। प्रदीप शुक्ल द्वारा लिखी मुकरियों में आम जन- जीवन की छोटी-छोटी चीजों और गतिविधियों की झलकियां देखने को मिलेंगी। उनकी इन मुकरियों में ग्रामीण पृष्ठभूमी की छाप, प्रकृति परिवेश, लोग, खेत-खलिहान आदि साफ दिखाई देते हैं। हर विषय को प्रदीप ने अत्यंत प्रभावी ढंग से प्रस्तुत किया है। उनकी मुकरियों में जितनी विविधताएं हैं, वे उन्हें मनोरंजक बनाती हैं।  

किताब- प्रदीप शुक्ल की कह मुकरियां 
कवि- प्रदीप शुक्ल
प्रकाशक- मंतव्य पत्रिका, लखनऊ
मूल्य-100  रुपये
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