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Lord krishna from book bharat mein mahabharat

इस हफ्ते की किताब

इतिहास, वर्तमान और भविष्य के मोड़ पर श्रीकृष्ण

प्रभाकर श्रोत्रिय

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श्रीकृष्ण संसार का प्रतिबिंब भी हैं और संसार से परे भी हैं। हमेशा पूर्ण बनने की चाह के बीच अपूर्णता झेलती इस दुनिया में उनके मूल्य, उनके सत्य और उनका धर्म आज हमें जरूरी लगता है, तो इसकी एक बड़ी वजह यह है कि वे कर्ता भी हैं और भोक्ता भी। वे वर्तमान भी हैं और भविष्य भी।

कृष्ण ने अर्जुन को गीता के द्वारा जो कर्मण्यता का उपदेश दिया था, वह स्वयं उनके आचरण का अंग भी था। वे कर्मयोगी थे। उन्होंने स्थापित किया कि जिस समय हमारा जो कर्तव्य होता है, उसका निर्वाह करना ही कर्म है। युद्ध जैसे हिंसक कर्म को भी कृष्ण 'कर्म' कहते हैं- यदि वह आपके कर्तव्य, लोकहित और आवश्यकता में शामिल हो। शासन-कर्म, न्याय-कर्म, जीवन-कर्म, युद्ध-कर्म, जैसे सभी कर्तव्य, कर्म में शामिल होते हैं। कृष्ण कहते हैं : 'कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेशु कदाचन।' कर्म करते हुए कर्म पर ही हमारा अधिकार होता है।

कर्म और फल का कार्य-कारण संबंध नहीं है, फल अनिवार्य नहीं है। अत: कर्म करना ही करणीय है। कृष्ण के कर्म का दर्शन 'निस्पृह-कर्म' है। अर्जुन के मोह और स्मृति से भरे मन के लिए कृष्ण का संदेश है- मोह के बिना कर्म किया जाना चाहिए। इसलिए वे महाभारत में बार-बार क्रोध और घृणा के बिना युद्ध करने का उपदेश देते हैं। इसी कर्म-दर्शन से ये सारे कर्म स्पृहणीय हो जाते हैं। उदाहरण के लिए बिना काम भाव और सौंदर्यानुभव के मैथुन, 'काम' नहीं, नियोग है। जिन कर्मों में तटस्थता नहीं हो सकती, ऐसे कर्मों में भी तटस्थता रख पाना स्थितप्रज्ञता है। इसी को 'अकर्म' कर्म कहा जाता है। यही कर्म की सच्ची भावना है। योग यदि चित्तवृत्ति निरोध को कहते हैं, तो कर्मयोग भी कर्म के संबंध में चित्रवृत्ति निरोध ही है-निरपेक्ष रूप से कर्म करना। इससे मनुष्य में उत्साह और सातत्य बना रहता है। 

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ष्ण न अर्जुन हैं, न भीष्म, न युधिष्ठिर

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