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हर बारिश में: किताब यात्राओं के दूसरे पहलुओं से परिचय करवाती है कि यात्रा यूं भी की जाती है

har barish mein by nirmal verma book review in hindi
                
                                                                                 
                            
निर्मल वर्मा की किताब 'हर बारिश में' बीते दिनों पढ़ कर पूरी की है। मैंने इसे शीर्षक देखकर चुना था। निर्मल पसंदीदा कथाकारों में से एक हैं। किताब के उनवान से लगा कि उनकी बेहद सुंदर भाषाशैली में कल्पनाओं का वही पुट मिलेगा जो उनकी लील टीन की छत या अंतिम अरण्य से मिलता है। लेकिन यह अलग है। इसे यात्रा-वृत्तांत कहा जाता है। लेकिन लेखक स्वयं इसे पूरी तरह यात्रा-वृत्तांत नहीं समझते।


यह वैसा यात्रा-वृत्तांत नहीं है जहां किसी स्थान के क़िस्सों को तमाम बिम्बों के साथ पाठकों के सामने प्रस्तुत किया जाता है, जहां सब सुखद है और यायावरी के एहसाह हैं। लेकिन इसमें यह सब कतई नहीं है। निर्मल लगभग 12 साल यूरोप के चेकोस्लोवाकिया की राजधानी प्राग में रहे थे। इस दौरान यूरोप के अन्य देशों को भी उन्होंने क़रीब के देखा, वहां के लेखकों से मिलना-जुलना रहा। किताब उसी दृष्टिकोण का विस्तार है, पर्यटन से अलग क्रान्ति, समाजवाद और यूरोपीय लेखन आदि की चर्चा है। भारतीय कलाकारों पर भी कुछ टिप्पणी हैं और हिन्दुस्तानियों के अंग्रेज़ी और अंग्रेज़ों के प्रति नज़रिए पर भी।

बीते दिनों गीतांजलि श्री की अंग्रेज़ी में अनूदित किताब को लंदन में बुकर मिला था। मुझे ये बात इस संदर्भ में यह मिलती-जुलती लगी जब इस किताब में एक चेक उपन्यासकार इवान क्लीमा का वक्तव्य पढ़ा। उनसे पूछा गया था कि चेक भाषा में लिखने के कारण उनकी किताबें वैश्विक नहीं हो पा रही हैं। तब इवान कहते हैं कि, "यह सही है कि वे कलाकार जो विश्व-भाषा में लिखते हैं, उन्हें अपेक्षाकृत आसानी से विश्वत्व और यश प्राप्त हो जाता है। किन्तु मैं यह नहीं सोचता कि विश्वत्व और यश प्राप्त करना लेखक का लक्ष्य है या होना चाहिए। हमें यह भी नहीं भूलना चाहिए कि आज के युग में यदि किसी कृति का थोड़ा-सा भी महत्व है तो वह दुनिया में अपना रास्ता ज़रूर बना लेती है - चाहें वह एक ऐसी भाषा में ही क्यों न लिखी गयी हो जिसे बहुत कम लोग समझते-बोलते हैं।"

मुझे लगता है कि ऐसी कृतियों के लिए ही अनुवाद की आवश्यकता महसूस होती होगी। निर्मल की यह किताब कई अर्थों में बहुत गूढ़ है, कई हिस्सों और क़िस्सों को एक-साथ समेटे। समाजवाद से लेकर यूरोप के बुर्जुआ तक। प्राग में सिनेमा के चाव से लेकर चेक लोगों की क्रान्ति और विरोध को लेकर सोच तक। लगभग 170 पेज की छोटी सी किताब को कई बार पढ़ना होगा। इतिहास को खंगाल कर उसे समझने के बाद ही किताब समझ में आ सकती है। 'हर बारिश में' यात्राओं के दूसरे पहलुओं से परिचय करवाती है कि यात्रा यूं भी की जाती है।
2 months ago

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