एक देश बारह दुनिया - विकास की वास्तविकता पर ग्रामीण भारत का शोध-विवेचन

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समीक्षक - पंकज स्वामी 

ग्रामीण पत्रकार शिरीष खरे की पुस्तक 'एक देश बारह दुनिया' का हर एक रिपोर्ताज सामाजिक, आर्थिक व राजनैतिक रूप से तह में जाने की कोशिश करता है और प्रत्येक परिस्थिति को संवेदनशीलता के साथ प्रस्तुत भी करता है। पुस्तक की एक विशेषता यह भी है कि लेखक की बैचेनी और कसमसाहट पुस्तक पढ़ते हुए अंत में पाठक की बैचेनी व कसमसाहट में बदल जाती है।

शिरीष खरे ने लंबे समय तक पत्रकारिता की है। उन्होंने एक मीडिया संस्थान में नर्मदा नदी पर कवर स्टोरी की थी। उस स्टोरी के लिए वे मध्य-प्रदेश में नर्मदा के किनारे-किनारे नदी के उद्गम-स्थल अमरकंटक से होशंगाबाद जिले के केसला गांव तक घूमे थे। बतौर सामाजिक घुमक्क्ड़ घूमना और वहां के सामाजिक सरोकारों के मुद्दे पर लिखना उनकी प्रवृत्ति है। नर्मदा नदी पर की गई उनकी रिपोर्टिंग व्याख्यात्मक रिपोर्टिंग का एक नायाब नमूना है। संभवत: इस विशिष्टता के कारण शिरीष खरे ‘एक देश बारह दुनिया’ जैसी पुस्तक लिख पाए। शिरीष खरे की बारीक दृष्टि है। उनकी यात्राएं केवल तफ़रीह के लिए नहीं होती हैं, बल्कि वे आसपास के उन व्यक्तियों, स्थानों व घटनाक्रमों को गहराई से देखते हैं, जिन्हें आमतौर पर कोई व्यक्ति देख नहीं पाता है। इन स्थानों पर मीडिया का ब्लैक आउट है।

'राजपाल एंड सन्स', नई दिल्ली से प्रकाशित इस पुस्तक की खासियत देश में उपेक्षित और तिरस्कृत प्राकृतिक संसाधन तथा लोगों जैसे नदी, पर्यावरण, ग्रामीणों, किसानों, आदिवासियों, दलितों, महिलाओं, घुमंतुओं, वेश्याओं की त्रासदी का वर्णन है। शिरीष खरे यात्रा करते हुए वहां पहुंचते हैं, जहां सामान्यत: किसी की नज़र नहीं पड़ती और न ही उन्हें तवज्जो दी जाती है। इस पुस्तक को एक जमीनी पत्रकार के बनने की प्रक्रिया, उसकी पत्रकारिता से जुड़ी जीवन व दृष्टि का एक विस्तार कह सकते हैं।

शिरीष खरे के यात्रा लेखन को सबसे पहले साहित्यिक पत्रिका ‘पहल’ के संपादक ज्ञानरंजन ने महत्त्वपूर्ण मानते हुए यात्रा वृत्तांत को सीरिज के रूप में छापना शुरू किया था। इसमें शिरीष खरे ने अमृतलाल वेगड़ व रजनीकांत यादव के पश्चात् नर्मदा की दुर्दशा का बयान किया था। ‘एक देश बारह दुनिया’ के माध्यम से जहां नर्मदा नदी की दुर्दशा व रेत खनन सामने आता है, तो वहीं महाराष्ट्र के मेलघाट से शोकाकुल यात्रा का विवरण पढ़ने को मिलता है।

मेलघाट (विदर्भ) में बच्चों की मौत से पत्रकार के भीतर का साहित्यिक आदमी दहल जाता है। वे लिखते हैं, ‘’मैं कभी यह जान ही नहीं पाता कि इस तरह के दर्द को झेलने का जज्बा कायम रखना एक पत्रकार के लिए उससे भी बड़ी चुनौती हो सकती है।’’ वहीं, महाराष्ट्र के मराठवाड़ा अंचल के तिरमली बंजारों द्वारा बंजर ज़मीन में खेती करने की कथा रोमांचक है। इसी तरह, दंडकारण्य (छत्तीसगढ़) वृत्तांत में स्टील व हीरे के बीच वहां के मूल निवासियों की जिजीविषा को व्यक्त किया गया है।
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9 months ago

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