दर्द मांजता है: सामाजिक आईना दिखातीं कहानियां

dard manjta hai book review in hindi
                
                                                             
                            

आज वक्त जिस तरह से भागता जा रहा है और उसके पीछे हम अपनी तमाम जिम्मेदारियों और प्राथमिकताओं को अनदेखा कर दौड़ रहे हैं, उससे कहीं न कहीं हम ही प्रभावित हो रहे हैं। अपने गांव से निकलकर लोग इसी आशा में बड़े शहरों में पनाह पा रहे हैं कि आगे बढ़ सकें, लेकिन पीछे अपनी बुनियाद कहीं ढह रही है। चंद खुशियां पाने के लिए और सफलता की सीढ़ी चढ़ने के लिए हम अस्थायी रिश्ते बना रहे हैं। संबंधों से प्रेम अछूता हो गया है और हम उपलब्धियों की राहों में अकेले खड़े हैं। जिंदगी की इन्हीं उलझनों को लेखक रणविजय ने अपनी पुस्तक में उतारा है। सरकारी व्यवस्थाएं, भ्रष्टाचार, सफलताएं, विफलताएं, प्रेम और रोष जैसे मुद्दे उनकी कहानियों में दिखते हैं। हर कहानी एक अलग परिस्थिति को दर्शाती है और अंत में आते-आते एक नया पाठ समझाती है।

किताब- दर्द मांजता है...
लेखक- रणविजय
प्रकाशक- साहित्य मंच, नई दिल्ली
मूल्य- 110 रुपये

3 years ago

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