पत्रकारिता की एक ज़रूरी किताब - कम्यूनिकेशन

communication book review in hindi
                
                                                             
                            अभी कुछ ही दिन हुए मेरे पास एक पुस्तक आयी कमुनिकेशन, जिस में दर्ज है पत्रकारिता का इतिहास–दो सौ वर्षों का। यह एक प्रामाणिक पुस्तक है। परम्परागत लेखन से बिलकुल जुदा-अपने भीतर एक इतिहास को लेकर। कई अध्यायों में है यह पुस्तक।
                                                                     
                            

इसके पहले अध्याय में लेखक ने पत्रकारिता के उद्गम और विकास में विज्ञान और तकनीक के साथ पत्रकारिता ने कैसे अपनी यात्रा प्रारम्भ की। सूचना को सुरक्षित रखने में कैसे विज्ञान और तकनीक ने संभव बनाया। इसके पहले श्रुति की परम्परा थी, जो गुरु के माध्यम से समाज तक पहुँच पाती थी। लेकिन जन जन तक पहुंचाने में विज्ञान और तकनीकी विकास ने इसे शनैः शनैः आगे बढाया और जनाकाक्षाओं की पूर्ति की। 15 वीं शताब्दी में जर्मनी से हुई शुरुआत ने आज पांच सौ वर्ष से ज्यादा की अपनी एक लम्बी यात्रा तय की है, जो जनमाध्यमों के विकास में अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।

1674 में ईस्ट इंडिया कंपनी ने बम्बई और 1772 में  मद्रास में प्रिंटिंग प्रेस लगाया। पहला अखबार हिक्की गजट प्रकाशित हुआ, जिसने हिन्दुस्तान में पत्रकारिता की नींव रखी। फिर धीरे- धीरे विकास की गति तेज होती गई। देश के स्वतंत्रता आन्दोलन में अपनी महत्वपूर्ण भूमिका का निर्वाह किया। इसके मद्देनजर अंग्रेजों ने कानून भी बनाए। जिससे वे अपने विरुद्ध उठने वाली आवाज को दबा सकें जिनमें वर्नाकुलर एक्ट भी एक है। इस पुस्तक में इन सभी का विस्तार एक ऐतिहासिक दस्तावेज के रूप में मौजूद है।

30 मई 1826 को उदंत मार्तंड का प्रकाशन कलकत्ता से शुरू हुआ, जो हिन्दी का पहला अखबार था। इसके बाद हिन्दी के अखबारों का सिलसिला प्रारम्भ हुआ, लेकिन इसकी प्रकाशन अवधि बहुत कम थी–4 दिसंबर 1827 को इसका अंतिम संस्करण निकला। लेकिन इस अखबार ने दूसरों को प्रोत्साहित किया ही, इस बात से असहमति नहीं जताई जा सकती। उसके बाद अख़बारों के प्रकाशन का सिलसिला शुरू हुआ जो बनारस, मध्य प्रदेश सहित लगभग सभी प्रान्तों से निकले, जिसमें बनारस अखबार, नवभारत, आज जैसे समाचार पत्र थे। गांधी जी की पत्रकारिता में योगदान को भी काफी विस्तार दिया गया है। गांधी जी को इस बात का एहसास हो गया था कि सामाजिक उत्थान सहित राज्नीतिक उद्देश्य की पूर्ति भी बिना अखबार के संभव नहीं है। उन्होंने, हरिजन, इंडियन ओपिनियन जैसे अखबारों के माध्यम से पत्रकारिता के महत्व को समझा। पत्रकारिता के इतिहास में यह “गांधी एरा” के नाम से जाना जाता है।

मुझे यह कहने में तनिक भी संकोच नहीं है कि डेढ़ दशक से भी ज्यादा समय तक पत्रकारिता का अध्यापन किया, लेकिन विजय भास्कर की इस पुस्तक की श्रेणी की कोई पुस्तक कम से कम मुझे नहीं मिली, जिसमें दो सौ वर्षों के समाचार पत्रों का इतिहास हो। इस पुस्तक के अंत में 1780 से लेकर 1947 के मध्य प्रकाशित होने वाले समाचार पत्रों की सूची है, जिसमें उनके संस्थापकों, संपादकों, आवृतियों एवं उनके प्रकाशन स्थल का भी नाम शामिल किया गया है। इसके संकलन में निश्चित ही काफी परिश्रम करना पडा होगा लेखक को, जिसके लिए वह साधुवाद के पात्र हैं।

विजय भास्कर एक विज्ञान लेखक के तौर पर पहले ही ख्याति अर्जित कर चुके हैं, विज्ञान लेखन में उन्हें विशेषरूप से भविष्य विज्ञान (फ्युचरोलाजी) में दक्षता हासिल है। उन्होंने अपनी पत्रकारिता टाइम्स ग्रुप मुंबई से शुरू की और नवभारत टाइम्स, प्रभात खबर, लोक्मत समाचार, दैनिक हिन्दुस्तान आदि समाचार पत्रों में अपना महत्वपूर्ण योगदान दिया। तीन वर्षों तक ब्रिटिश उच्चायोग, नई दिल्ली के ‘प्रेस एंड पब्लिक अफेयर्स ‘विभाग में वरिष्ठ सम्पादक रहे। ‘सेंट्रल आफिस ऑफ इन्फार्मेशन और ‘फारेन एंड कामनवेल्थ आफिसेस ‘लन्दन में विशेष प्रशिक्षण भी प्राप्त किया।

इसके पूर्व विजय भास्कर की एक पुस्तक हिन्दी में ‘बिहार की पत्रकारिता का इतिहास‘ नाम से प्रकाशित हो चुकी है। अंग्रेजी में लिखी गयी विजय भास्कर की यह पुस्तक न सिर्फ पत्रकारिता के विद्यार्थियों बल्कि अध्यापकों के लिए भी उपयोगी है।

समीक्षक - सुनील श्रीवास्तव   
3 weeks ago

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