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देश ही देश

इस हफ्ते की किताब

देह ही देशः देह पर जिंदगी के सारे युद्ध

मनोरंजन डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली

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यूगोस्लाविया के विखंडन के सच में औरत के मन के कितने कांच टूटे होंगे? कितने सपने छूटे होंगे? गरिमा श्रीवास्तव की किताब ‘देह ही देश’ से गुजरते हुए लगता है कि शब्द दिमाग के जरिए दिल तक की यात्रा कर रहे हैं और कह रहे हैं कि ऐसे अनुभव आज तक इतिहास की किसी भी किताब में क्यों नहीं जगह पाते हैं?

लेखिका द्वारा उनके क्रोएशिया प्रवास के दौरान वहां के अनुभवों पर लिखी डायरी किताब की शक्ल में लोगों के सामने आई है। इस डायरी का मुख्य विषय पूर्वी यूरोप के संयुक्त यूगोस्लाविया में 90 के दशक में हुए युद्ध और झड़पों के बाद देश के हुए विखंडन से विस्थापित हुए नागरिकों खासकर स्त्री की स्थिति है।

शारीरिक और मानसिक शोषण के बाद स्त्री कितना जीती है, यह एक ऐसा सवाल है, जो इस किताब में देह से देश तक की यात्रा करता रहता है।

देह ही देश
लेखिका- गरिमा श्रीवास्तव
प्रकाशक- राजपाल प्रकाशन, दिल्ली
मूल्य- 285 रुपये
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