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ashaad ke teen din

इस हफ्ते की किताब

स्त्री-पुरुष के निजी जीवन का यथार्थ प्रस्तुत करता - 'आषाढ़ के तीन दिन'

अमर उजाला काव्य डेस्क, नई दिल्ली

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“ हर चीज़ जो पैदा हुई है अपने साथ मृत्यु के निशान भी लेकर आई है. आकर्षण हुआ तो उम्र छोटी होगी, प्यार होगा तो थोड़ा और खींच जाएगा पर मरना दोनों को है. यह आकर्षण भी अपनी ही मौत मरेगा ।” – अषाढ़ का तीन दिन 
मृत्युंजय प्रभाकर द्वारा लिखित नाटक ‘अषाढ़ का तीन दिन’ तीन अंकों और बारह दृश्यों में देह के होने के औचित्य, प्यार,विवाह,सेक्स और उसकी नैतिकता, स्त्री-पुरुष के मन और उसके दुख की इयत्ता को बहुलार्थता और प्रश्नाकुलता के साथ न केवल उपस्थित करती है बल्कि स्त्री पात्रों सावित्री, मालविका और शकुंतला के माध्यम से स्त्री के चयन की स्वतन्त्रता जिसमें विवाह, बच्चे,कैरियर के मुद्दे शामिल हैं, उससे उत्पन्न द्वंध तथा संघर्ष को विभिन्न नाटकीय इमेजेज़ के माध्यम से प्रस्तुत करती है ।
इस नाटक के भूगोल में तीन पुरुष पात्र सृंजय कपूर , महेन्द्र नथानी, मदन मोहन गुगलानी और तीन स्त्री पात्र मालविका अग्निहोत्री, सावित्री दुबे, शकुंतला दुबे अपनी रचनात्मकता और उसकी संभाव्य प्रस्तुति की तपिश में मोहन राकेश के प्रसिद्ध नाटक ‘अषाढ़ का एक दिन’ के रिहर्सल के लिए मुंबई में सावित्री और महेंद्र जो कि पति-पत्नी हैं के घर में इकट्ठे होते हैं । सावित्री और महेंद्र की बेटी है शकुंतला । 

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आषाढ़ के तीन दिन

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