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alok srivastava a simple poet with deep feeling presented by amar ujala kavya

काव्य चर्चा

आलोक श्रीवास्तव: संजीदा शब्दों के साथ रिश्तों में शहद की मिठास 

अमरउजाला काव्य डेस्क, नई दिल्‍ली

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भाव के प्रवाह में बहने के बजाय ठहर कर सरल शब्दों में गहरी कविताएं और शेर की बानगी आलोक श्रीवास्तव ने कम उम्र में लंबा सफर तय कर लिया है। हंसमुख, संजीदा और रिश्तों को शहद की मिठास देने वाले आलोक की गजलों और शेरों को देश की बड़ी हस्तियों ने अपनी आवाजें दी हैं। जगजीत सिंह तो इस दुनिया को छोड़ गए लेकिन उन्होंने भी अपनी मधुर आवाज से आलोक श्रीवास्तव की गजलों को गाया है। अमिताभ बच्चन, पंकज उधास, तलत अजीज और शुभा मुद्गल ने भी उनके काव्य को आवाजें दी हैं। आलोक जी की अम्मा और बाबूजी पर लिखी कविता तो उनकी सबसे लोकप्रिय रचना है। आलोक जी की कविताओं का देश की अन्य भाषाओं में अनुवाद भी किया जा रहा है। हिंदी के सबसे बड़े आलोचक नामवर सिंह उन्हें दुष्यंत की परंपरा का आलोक मानते हैं।    

सधे हुए गीतकार आलोक श्रीवास्तव रिश्तों पर सीधे-सच्चे और संजीदा भाव व्यक्त करते हैं। 30 दिसंबर 1971 को मध्य प्रदेश के शाजापुर में जन्मे आलोक श्रीवास्तव का बचपन विदिशा में बीता और वहीं हिंदी में स्नातकोत्तर तक शिक्षा ग्रहण की। आमीन कविता संग्रह और आफरीन कहानी संग्रह इनकी दो चर्चित रचनाएं है।

'घर में झीने रिश्ते मैंने लाखों बार उधड़ते देखे
चुपके-चुपके कर देती है जाने कब तुरपाई अम्मा'


आलोक मूल रूप से कविता को भाव व्यंजन का अतिरेक नहीं मानते हैं। वह उन्हें सरल शब्दों का कलेवर देते हैं जो हर किसी को गहरे ढंग से प्रभावित करता है। मीडिया में कार्य करने की वजह से देश, काल, वातावरण से पूरी तरह परिचित आलोक जी को काफी सारे पुरस्कारों से भी नवाजा गया है।

तुम सोच रहे हो बस, बादल की उड़ानों तक
मेरी तो निगाहें हैं, सूरज के ठिकानों तक

टूटे हुए ख़्वाबों की इक लम्बी कहानी है
शीशे की हवेली से, पत्थर के मकानों तक

दिल आम नहीं करता, अहसास की ख़ुशबू को
बेकार ही लाए हम चाहत को ज़ुबानों तक

लोबान का सौंधापन, चंदन की महक में है
मंदिर का तरन्नुम है, मस्जिद की अज़ानों तक

इक ऐसी अदालत है, जो रूह परखती है
महदूद नहीं रहती वो सिर्फ़ बयानों तक

हर वक़्त फ़िजाओं में, महसूस करोगे तुम
मैं प्यार की ख़ुशबू हूं, महकूंगा ज़मानों तक


मां पर लिखी उनकी कविता रिश्तों का गहरा एहसास देती है और मां शब्द की सुंदर व्याख्या करती है। बाबू जी पर लिखी कविताएं जैसे अभिभावकों के सम्मान में एक अलख का कार्य कर रही हैं।

ले गया दिल में दबा कर राज़ कोई
पानियों पर लिख गया आवाज़ कोई

बांध कर मेरे परों में मुश्क़िलें
हौंसलों को दे गया परवाज़ कोई

नाम से जिसके मेरी पहचान है
मुझमें उस जैसा भी हो अंदाज़ कोई

जिसका तारा था वो आंखें सो गईं
अब नहीं करता है मुझपे नाज़ कोई

रोज़ उसको ख़ुद के अंदर खोजना
रोज़ आना दिल से इक आवाज़ कोई


आलोक जी की कहानियां उनकी गजलों का ही एक तरह से विस्तार है। आलोक जी इसे स्‍वीकार भी कर चुके हैं। घर में ही उन्हें तालीम और संस्कार मिले जिनकी वजह से वह आज मोतियों जैसे शब्दों की रचना करने में सक्षम हैं। मां-पिता को उर्दू का शौक और साहित्य की गहरी समझ थी। भाई भी गीत-संगीत पर ध्यान देते थे। घर में अक्सर काव्य महफ़िलें, बहसें और साहित्यिक बैठकें होती थीं। जिनका गहरा असर आलोक की काव्य शैली पर पड़ा। 

अब तो ख़ुशी के नाम पे कुछ भी नहीं रहा
आसूदगी के नाम पे कुछ भी नहीं रहा

सब लोग जी रहे हैं मशीनों के दौर में
अब आदमी के नाम पे कुछ भी नहीं रहा

आई थी बाढ़ गांव में, क्या-क्या न ले गई
अब तो किसी के नाम पे कुछ भी नहीं रहा

घर के बुज़ुर्ग लोगों की आंखें ही बुझ गईं
अब रौशनी के नाम पे कुछ भी नहीं रहा

आए थे मीर ख़्वाब में कल डांट कर गए
क्या शायरी के नाम पे कुछ भी नहीं रहा?


आलोक जी कहते हैं कि वह लिखते समय बस लिखते हैं। ज्‍यादा सोचते नहीं हैं। उनकी नजर में दिल के कामकाज में दिमाग की भूमिका संदिग्‍ध होती है। रिश्तों को काफी अहमियत देने वाले आलोक के मन में इंसानी रिश्तों के लिए एक विशेष अनुराग है। वह आपसी रिश्तों को काफी सम्मान देते हैं। यही उनके काव्य की मुख्य विशेषता है। 

जीवन के दुश्वार सफ़र में, बेमौसम बरसातें सच,
उसने कैसे काटी होंगी, लंबी-लंबी रातें सच

जाने क्यों मेरी नींदों के हाथ नहीं पीले होते
पलकों से ही लौट गई हैं सपनों की बारातें सच

'तुम्हारे पास आता हूं तो सांसे भीग जाती हैं
मुहब्बत इतनी मिलती है कि आंखें भीग जाती है'



 
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