सरकार ने पूछा- अब तक क्यों नहीं बना कैंसर संस्थान, रिम्स ने कहा- प्रक्रिया जारी है

न्यूज डेस्क, अमर उजाला, रांची Updated Fri, 17 May 2019 05:05 PM IST
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राजेंद्र इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंसेस (रिम्स) (फाइल फोटो)
राजेंद्र इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंसेस (रिम्स) (फाइल फोटो) - फोटो : rims

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झारखंड की राजधानी में राजेंद्र इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंसेस (रिम्स) के विकास और स्वास्थ्य सेवाओं को बेहतर बनाने के लिए केंद्र और राज्य सरकार की ओर से दी गई निधि का इस्तेमाल नहीं पाया है। गौरतलब है कि एक साल पहले केंद्र और राज्य ने रिम्स को कैंसर विभाग के लिए आधुनिक उपकरण खरीदने के लिए 38.25 करोड़ रुपये दिए थे। अस्पताल को इस विभाग में विशेषज्ञ चिकित्सकों और कर्मचारियों को भी नियुक्त करना था। लेकिन इन रुपयों का कोई उपयोग नहीं किया जा सका और यह अस्पताल के खाते में पड़े हुए हैं। 

सालभर से रिम्स के खाते में पड़े हैं 38.25 करोड़ रुपये

केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय ने रिम्स को मार्च 2018 में दिए गए 38.25 करोड़ रुपयों का अब हिसाब मांगा है। मंत्रालय ने रिम्स से पूछा, "इन पैसों का क्या किया गया।"  इसके जवाब में रिम्स निदेशक ने कहा, "कैंसर विभाग के लिए मशीन की खरीद प्रकिया में है। डॉक्टरों की नियुक्ति की भी कोशिश की जा रही है।" जून 2018 में रिम्स के तत्कालीन निदेशक डॉ. आरके श्रीवास्तव ने केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय के साथ हुई बैठक में लिखित आश्वासन दिया था कि मार्च 2019 तक स्टेट कैंसर इंस्टीट्यूट चालू हो जाएगा। 
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बता दें कि राज्य में कैंसर के मरीजों को बेहतर इलाज के लिए दूसरे राज्यों में जाना पड़ता है। मरीजों को आस है कि रिम्स कैंसर इंस्टीट्यूट में चिकित्सा सुविधाएं बेहतर हों ताकि वे अपने घर में रहते हुए राज्य में इलाज करा सकें। 

एक बार रद्द करनी पड़ी टेंडर प्रक्रिया

रिम्स में एनपीसीडीएस (नेशनल प्रोग्राम फॉर प्रिवेंशन एंड कंट्रोल आफ कैंसर, डायबिटीज, कार्डियोवेस्कुलर डिजीज एंड स्ट्रोक) प्रोग्राम के तहत स्टेट कैंसर इंस्टीट्यूट के लिए 29 मार्च 2018 को 38.25 करोड़ रुपये आवंटित किए गए। इसमें केंद्र सरकार ने अपने हिस्से के तौर पर 22.95 करोड़ रूपये और राज्य सरकार ने 15.30 करोड़ रूपयों का अपना योगदान दिया। मशीनों की खरीद के लिए रिम्स प्रबंधन ने 31 जुलाई 2018 को टेंडर निकाला। इस टेंडर में कंपनियों ने कोई रुचि नहीं दिखाई। खरीद प्रक्रिया में सिर्फ एक टेंडर होने की वजह से 18 अप्रैल 2019 को हुई तकनीकी समिति की बैठक में टेंडर रद्द करने का फैसला लिया गया। इसके बाद 30 अप्रैल को फिर टेंडर निकाला गया। 
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