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सामने चौकियों से स्कूल पर गोले बरसाता था पाकिस्तान, अब खुले में हो रही पढ़ाई

मुनीश शर्मा, अमर उजाला, पुंछ Published by: Vikas Kumar Updated Tue, 02 Mar 2021 03:47 AM IST
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एलओसी के आखिरी स्कूल कीरनी में पढ़ते विद्यार्थी
एलओसी के आखिरी स्कूल कीरनी में पढ़ते विद्यार्थी - फोटो : amar ujala

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पाकिस्तानी गोलाबारी से अमूमन बंद रहने वाले स्कूल में अब गुनगुनी धूप के बीच खुले में कक्षाएं लग रही हैं। एलओसी के आखिरी गांव कीरनी के मिडिल स्कूल के सामने पाकिस्तानी सेना की चौकियां हैं और इस तरफ ब्लैकबोर्ड पर शिक्षक बच्चों को बेखौफ पढ़ा रहे हैं। भारत-पाकिस्तान सेना के बीच संघर्ष विराम समझौते से अचानक माहौल पूरी तरह से बदल गया है। स्कूल के शिक्षकों को भी यकीन नहीं हो रहा कि बच्चों की हाजिरी यकायक पूरी हो गई है। 
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गोलाबारी से लगातार प्रभावित रहे कीरनी सेक्टर के इस स्कूल में सोमवार को 95 छात्र-छात्राएं हाजिर मिले। शिक्षक अलग-अलग कक्षाएं ले रहे थे। गोलाबारी की वजह से खुले में कक्षाओं की सख्त मनाही थी। गोलाबारी के चलते अमूमन बच्चे स्कूल के कमरों में ही कैद हो जाते थे। कब रेस्क्यू ऑपरेशन चलाना पड़े, कुछ कहा नहीं जा सकता था। इसी वजह से बच्चों की संख्या पंद्रह से बीस के आसपास ही पहुंच पाती थी। कई बार स्कूल को बंद रखना ही मुनासिब हो जाता। सोमवार को कक्षाएं लगने के साथ ही मिड डे मील भी परोसी गई। 


स्कूल के विद्यार्थियों आकिब, इमरान, नजमा, असमां जावेद, साइमां रकीब ने बताया कि हिंदुस्तान-पाकिस्तान के बीच समझौता हुआ है। इसकी जानकारी उन्हें घर वालों और आस पड़ोस के लोगों से मिली। तभी से उन्हें स्कूल आकर पढ़ाई करने का इंतजार था। ज्यादातर बच्चे स्कूल के समय से पहले ही पहुंच रहे हैं। पहले गोलाबारी का डर लगा रहता था। ज्यादातर बच्चे घर ही रहने को मजबूर हो गए थे। (संवाद)

बच्चे बोले - लगता है डॉक्टर बनने का सपना साकार होगा 
आठवीं कक्षा के छात्र आकिब ने कहा कि बड़ा होकर डॉक्टर बनने का सपना है। स्कूल की कक्षाएं शुरू होने से डॉक्टर बनने का सपना साकार होने की उम्मीद बनी है। दुआ है कि इसी तरह से अमन का माहौल बना रहे। स्कूल के इंचार्ज शिक्षक नजाम मीर ने कहा कि यकीन करना मुश्किल हो रहा है कि हालात इतने बदल गए हैं। बच्चे और स्टाफ दोनों बहुत उत्साहित हैं। पहले तो पाकिस्तानी गोले स्कूल की दीवारों पर आकर लगते थे। कई बार देर शाम अंधेरा होने तक बच्चों को स्कूल में रखना पड़ता था। बच्चों की हाजिरी पंद्रह से बीस रहती थी जो अब पूरी होने लगी है। उच्चाधिकारियों से अनुरोध किया गया है कि गोलाबारी से क्षतिग्रस्त दीवारों की मरम्मत करवाई जाए।

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