खामोश हुई डुग्गर लोक गायकी की आवाज

Jammu Updated Mon, 28 Jan 2013 05:30 AM IST
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जम्मू। डुग्गर के लोक गायक 84 वर्षीय गुलाम मोहम्मद का रविवार को निधन हो गया। रविवार को ही उनके पैतृक गांव डंसाल में उनको सुपर्द-ए-खाक कर दिया गया। विभिन्न राजनैतिक दलों और अन्य संगठनों ने गुलाम मोहम्मद के निधन पर गहरा दुख प्रकट किया है।
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माता के दरबार जोतां जागदियां जैसी कालजयी भेंट और साडा जम्मू ए बखरा शैह्र जी, इसे दिखने की आखदी ए लैहर जैसे गाने वाले गुलाम मोहम्मद का जन्म सन 1943 तहसील सांबा के गांव निहाड़ी में हुआ था। वे आकाशवाणी में ए ग्रेड आर्टिस्ट भी रह चुके हैं। अपने विशिष्ट योगदान के लिए उनको संगीत नाटक अकादमी के अलावा पैंथर्स पार्टी की ओर से डुग्गर रत्न से नवाजा गया है। डुग्गर की धर्म निरपेक्षता, आपसी प्रेम और मिलजुल कर रहने की तहजीब का गुलाम मोहम्मद दूसरा रूप थे। भाख और कारक में इनको खास दक्षता हासिल थी। गुलाम मोहम्मद के निधन पर विभिन्न दलों ने शोक प्रकट किया है। भारतीय जनता पार्टी के अध्यक्ष जुगल किशोर शर्मा ने शोक प्रकट करते हुए कहा कि यह हमारी संस्कृति का बड़ा नुकसान है। जीते जी तो सरकार को पद्मश्री के लिए इनकी याद नहीं आई, शायद मरने के बाद सरकार का इस तरफ ध्यान जाए।

नेशनल कांफ्रेंस के संभागीय अध्यक्ष देवेंद्र राणा का कहना है कि जो नुकसान गुलाम मोहम्मद के जाने का हुआ है उसकी भरपाई शायद ही कभी हो पाएगी। पैंथर्स पार्टी के सुप्रीमो प्रो. भीम सिंह का कहना है कि गुलाम मोहम्मद के जाने के बाद लोक गायकी में एक प्रकार से शून्य पैदा हो गया है। वहीं, उपाध्यक्ष एडवोकेट एचसी जलमेमोरिया का कहना था कि जिस समय डोगरी को आठवीं सूची में शामिल करने के लिए आंदोलन चलाया जा रहा था, उस समय इनका अहमद योगदान रहा है। जो प्रतिनिधिमंडल प्रधानमंत्री वाजपेयी से मिला था, गुलाम मोहम्मद उसमें भी शामिल थे।
वहीं, ट्राइबल रिसर्च एंड कल्चरल फाउंडेशन की ओर से शोक सभा का आयोजन कर गुलाम मोहम्मद और उनके योगदान को याद किया गया। रियासत की कला, संस्कृति और भाषा अकादमी के सचिव खालिद बशीर और आईसीसीआर के क्षेत्रीय निदेशक पद्मश्री बलवंत ठाकुर ने भी निधन पर शोक प्रकट किया है।

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