कम हाेती जा रही देसी कंबलाें की मांग

Udhampur Updated Mon, 22 Oct 2012 12:00 PM IST
भद्रवाह। पुराने जमाने से चली आ रही हस्तकरघा जिसे स्थानीय भाषा में खड्डी कहते हैं आज भी इलाके में जीवित है। पहले के जमाने में पहनने तक के लिए कपड़े इसी खड्डी पर बुने जाते थे, लेकिन वक्त के बदलने के साथ उपकरण भी बदलते चले गए।
खड्डी का स्थान मशीनों ने लेना शुरू कर दिया। धीरे-धीरे खड्डी से बुने कपड़ों की मांग कम होने लगी। लोग इसे भूलने भी लगे, लेकिन भद्रवाह के पहाड़ी इलाके में यह उद्योग अभी भी जिंदा है। इस उद्योग को जिंदा रखने वाले लोग इसके अस्तित्व को बचाने की लड़ाई लड़ रहे हैं। इस खड्डी से कपड़े बनाने लोग कहते हैं कि इस पर ज्यादातर कंबलों को बुना जाता है, स्थानीय भेड़ों से ली गई ऊन से बुना जाता है। यह देसी कंबल बहुत गर्म होता है और पहाड़ी इलाकों में इसका अपना अलग स्थान है। सर्दी के मौसम में खड्डी पर बनाया गया कंबल रजाई से ज्यादा गर्म होता है। कंबल बनाने वाले युवक ने कहा कि एक कंबल को बनाने में उसे चार से पांच दिन का समय लगता है।
कंबल बनाने में करीब तीन सौ से चार सौ रुपए की लागत आती है, लेकिन लागत के अनुरूप लाभ नहीं होने के कारण लोग इस व्यवसाय से मुंह मोड़ रहे हैं। उसने भी विभाग से कई बार सहायता के लिए गुहार लगाई, लेकिन कुछ हासिल नहीं हुआ। व्यवसाय से लोगों के मुंह मोड़ लेने के कारण बहुत कम लोग इसे बना रहे हैं इस कारण भी बाजार में इनकी मांग कम हो गई है।

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