25 साल के आतंकवाद ने रियासत को दुख-दर्द ही दिए

Sri nagar Updated Fri, 22 Nov 2013 05:44 AM IST
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d अमर उजाला ब्यूरो
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श्रीनगर। दो दशक से अधिक समय से आतंक से पीड़ित रियासत को आतंकवाद ने सिवाय दुख-दर्द के कुछ नहीं दिया है। करीब 25 साल से जारी खून-खराबे से कश्मीर मुद्दे का हल तो नहीं हुआ पर धरती की जन्नत कहे जाने वाले कश्मीर में हालात बद से बदतर होते चले गए।
वीरवार को त्राल में एक जनसभा को संबोधित करते हुए मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने यह बातें कहीं। उनका कहना था कि आतंकवाद से रियासत की स्थिति में सिर्फ नकारात्मक बदलाव हुए। इस दौरान एक इंच भूमि भी इधर से उधर नहीं हुई। उमर ने कहा कि कश्मीर में हालात के लिए न तो दिल्ली दोषी है और न ही इस्लामाबाद। यदि दोषी हैं तो वे हम हैं। उमर ने कहा कि कुछ ताकतों द्वारा 1990 में कश्मीर में आंदोलन शुरू किया गया था। उस दौरान नेशनल कांफ्रेंस के नेतृत्व व नेताओं ने किसी भय के कारण कश्मीर नहीं छोड़ा था, बल्कि वे चाहते थे कि कश्मीर समस्या के समाधान के लिए उन ताकतों द्वारा जो दावे किए जा रहे थे, वो पूरे हो सकें। पर आज नतीजे सबके सामने हैं। आंदोलन तो कहीं नजर नहीं आ रहा, बस खूनखराबा और ढेर सारी परेशानियां सामने आई हैं। विशाल जनसभा को संबोधित करते उमर ने कहा कि रियासत में विकास हो, इसके लिए लोकतांत्रिक व्यवस्था में अवाम की भागीदारी बहुत आवश्यक है। अवाम भागीदार बनेगी तो विकास तेजी से हो सकेगा। वहीं, इस दौरान उन्होंने एमबीबीएस पेपर लीक मामले में फंसे बोर्ड के पूर्व चेयरमैन की करतूत की भी निंदा की। कहा कि जब उनके अफसर ही रुपयों के लिए युवाओं का हक मारेेंगे तो वे किसी अन्य को दोषी करार कैसे दे सकते हैं। मुख्यमंत्री ने कश्मीर में विकास नहीं होने का ढींढोरा पीटने वालों को भी आड़े हाथ लिया। उन्होंने कहा कि ऐसा सोचने वालों को यह ध्यान में रखना होगा कि न तो सीमा पार से विकास करवाया जा सकता है और न ही पाकिस्तान के विदेश मंत्री सरताज अजीज से मुलाकात कर। इस दौरान उन्होंने हुर्रियत से भी विकास में भागीदार बनने की अपील की और साथ ही बनावटी रवैया अपनाने से परहेज करने की भी सलाह दी।
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