आतंकवाद भी कम नहीं कर पाया दीवाली का उत्साह

Sri nagar Updated Sun, 11 Nov 2012 12:00 PM IST
श्रीनगर। देश के अन्य भागों की तरह कश्मीर में भी दीवाली का पर्व धूमधाम के साथ मनाए जाने की तैयारियां जोरशोर से चल रही हैं। हिंदु तथा सिख समुदाय के लोग खासतौर पर जुटे हुए हैं। हालांकि कश्मीर में जम्मू जैसी रौनक तो नहीं है, बावजूद उसके पटाखों की खरीददारी के लिए उमड़े लोगों को देख दीवाली के त्योहार का अनुभव किया जा सकता है।
श्रीनगर शहर में भले ही जम्मू की तर्ज पर अलग से पटाखों के स्टाल तो नहीं हैं, लेकिन व्यस्त महाराजा बाजार में लगभग दो दर्जन दुकानों पर पटाखों की ब्रिकी जोरों से चल रही थी। दुकानदार मुश्ताक अहमद ने बताया कि पहले उसके मामा सालों से पटाखों की दुकान करते आ रहे हैं और अब वो इस व्यापार में हैं। उनका कहना था कि ईद की तरह ही दीपावली के पर्व पर भी उनकी ब्रिकी खूब होती है। हरि सिंह हाई स्ट्रीट में लंबे समय से दुकान कर रहे आलिम मोहम्मद को इस बात की खुशी है कि हिंदु और मुस्लिम समुदाय के त्यौहारों को मिल जुल कर मनाए जाने का सिलसिला आतंकवाद भी प्रभावित नही कर सका है। वो कहते है कि श्रीनगर शहर में हाल ही में आयोजित दशहरे की रौनक देख उनको 1990 के पूर्व का खुशनुमा माहौल याद आ गया था और वह दीपावली की रौनक को देख कर खुश हैं ।
हिंदु ही नहीं, काफी तादात में मुसलमान भी दीवाली के दिन पटाखे फोड़ते हैं। कुपवाड़ा जिले के सीमांत तंगधार इलाके से श्रीनगर में पटाखों की खरीददारी करने आए कुछ सिख युवकों ने बताया कि कुपवाड़ा में पटाखे उपलब्ध नहीं होने के कारण वह श्रीनगर आए हैं। इसके अलावा लाल चौक, जैनाकदल तथा कुछ दूसरे बाजारों में भी पटाखों के स्टाल दीवाली से एक दिन पहले सजाए जाते हैं। इसके अलावा घाटी में हिंदू पूजा स्थलों में भी दीपावली के दिन विशेष रौनक देखने को मिलती है। अमीरा कदल स्थित प्राचीन पंच मुखी श्री हनुमान मंदिर के महंत माधव दास कश्मीर की दीपावली की रौनक गत 50 सालों से देखते आ रहे हैं।
उन्होंने कश्मीर में बहुत कुछ बदलते हुए देखा हैं लेकिन उनकी नजर में दीपावली को मिल जुल कर मनाए जाने में कोई कमी नहीं आई है । यह बात अलग है कि कुछ राजनेता अपना स्वार्थ साधने के लिए धर्म का सहारा लेकर हिंदू-मुस्लिम लोगों को एक दूसरे से दूर करने का प्रयास करते हैं । उनका कहना है कि इसमें कोई दो राय नहीं की पिछले दो दशकों के दौरान कश्मीर में काफी कुछ बदला है, लेकिन मंदिर में दीपावली के दिन रौनक अब भी देखने को मिलती है। अधिकांश हिंदू परिवारों के पलायन कर जाने के बाद हिंदुओं की संख्या काफी कम रह गई हैं। उसके बावजूद दीवाली के दिन सैकड़ों लोग जिनमें कुछ मुस्लिम बच्चे भी होते हैं, इकट्ठे होकर देर रात तक पटाखे फोड़ते हैं तथा आतिशबाजी करते हैं।
हनुमान मंदिर ही नहीं जेष्ठा देवी मंदिर, पोखरीबल मंदिर, शारिक देवी मंदिरों आदि और कई गुरुद्वारों में इस मौके विशेष पूजा अर्चना और प्रकाश किया जाता है। जेष्ठा देवी प्रबंधक कमेटी के सदस्य राकेश रैना के अनुसार दीवाली की शाम मंदिर में आरती होती है और प्रसाद तैयार किया जाता है। रात के समय पटाखे फोड़े जाते हैं। उन्होंने बताया कि 1990 तक मंदिर में दीवाली मनाई जाती रही थी लेकिन आंतकपाद के कारण काफी समय तक कोई कार्र्यकम आयोजित नहीं किया जा सका था। बर्ष 2002 के बाद मंदिरों में दीवाली पर दोबारा कार्यक्रम आयोजित होना शुरू हो गई है।

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