अतीत में छुपा है बसोहली का खजाना

Kathua Updated Fri, 26 Oct 2012 12:00 PM IST
कठुआ। कूची और रंगों से गढ़ा जाने वाला चित्रकला का संसार अनोखा है। सदियों पूर्व से ही विश्व पटल पर पहचान बना चुकी बसोहली की चित्रकला ने कला पारखियों को अपना मुरीद बनाया है, लेकिन वर्तमान में यह कलानगरी अपने इस हुनर को आगे बढ़ाने के बजाए सिमटती नजर आ रही है। यह वही जगह है जहां न सिर्फ रियासत और देश बल्कि बाहरी देशों के कलाप्रेमी भी अनायास खिंचे चले आते हैं, लेकिन इनकी संख्या पहले की अपेक्षा काफी कम है। एक समय था, जब चित्रकला को लेकर बसोहली को एक संस्थान के रूप में देखा जाता था, लेकिन वर्तमान में यहां की चित्रकला नई पीढ़ी तक पहुंचने के बजाए दम तोड़ने लगी है। इतना ही नहीं विश्व भर में नायाब हुनर के रूप में स्थापित इस नगरी की चित्रकला से जुड़े लोग अब गिने चुने ही रह गए हैं।
पेंटिंग्स की पहचान
स्थानीय लोगों के अनुसार राजा भूपतदेव के शासन काल में चित्रकला से जुड़े रैणा परिवार को देश निकाला किए जाने के बाद यह परिवार कांगड़ा में जाकर बस गया। वहां जाकर उन्होंने कांगड़ा पेंटिंग्स का विस्तार किया। इस बारे में चित्रकला से जुड़े रहे एक परिवार के सदस्य सत्य प्रकाश रैणा ने बताया कि उनके पूर्वज भी इस कला को आगे बढ़ाते रहे हैं। वे बताते हैं कि बसोहली पेंटिंग्स में प्राकृतिक रंगों के इस्तेमाल से आकृति को जीवंत रूप दिया जाता है। हालांकि,कांगड़ा और जोधपुरी पेंटिंग्स के मुकाबले यह पेंटिंग सरल और बारीकी से भरी नहीं है, लेकिन कला के कागज पर उतरते ही एक नई अनुभूति होती है। बादामी आंखें और श्रीकृष्ण की तस्वीरों को नीले रंग में उतारा जाता है। बसोहली पेंटिंग से जुड़े कई चित्रकारों के पास इस नायाब चित्रकारी के बेजोड़ नमूने आज भी मौजूद हैं, जिन्हें काफी संजो कर रखा गया है। कुछ ऐसी भी कलाकारी है, जिसे ग्रहण लगने से बचाने के लिए कलाकार उन्हें व्यापारियों तक को दिखाने से परहेज करते हैं।
ट्रेंनिग के दौरान बच्चों को पांच सौ रुपये प्रतिमाह मानदेय देकर उनकी सहायता की जाती है। वर्ष 1980 से अब तक कुल 189 बच्चों को प्रशिक्षित किया जा चुका है। इसके लिए बाकायदा एक सीनियर और एक जूनियर इंस्ट्रक्टर तैनात किए जाते हैं। कठुआ, सांबा और विजयपुर में इस तरह के ट्रेनिंग सेंटर खोलने के लिए विभाग को लिखा जा चुका है।
-राम भूषण, ट्रेंनिग अधिकारी, हैंडीक्राफ्ट, कठुआ

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