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West Bengal: कुम्हार टुली में मिलता है मां को मूर्त रूप, युवा संभालने लगे हैं परंपरागत विरासत

एन. अर्जुन, कोलकाता Published by: निर्मल कांत Updated Sun, 02 Oct 2022 03:26 PM IST
सार

कोलकाता में गंगा के किनारे बसे शिल्पकारों की एक छोटी सी बस्ती को आज दुनिया कुम्हार टुली के नाम से जानती है। दुनिया में जहां-जहां भी हिंदू खासतौर पर बंगाली हिंदू बसते हैं, दुर्गापूजा के समय यहीं से मां दुर्गा की मूर्तियां मंगवाते हैं।

अपने पिता पार्थो पाल के साथ निवेदिता
अपने पिता पार्थो पाल के साथ निवेदिता - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार

जबसे मैंने होश संभाल है, तबसे इन मर्तियों के बीच ही अपने को पाया। मिट्टी और रंग हमारे खून में रच बस गए हैं। हमारे मन और प्राण हैं, मूर्तियां। मुझे गर्व है कि मैं इस खानदान की सातवीं पीढ़ी हूं, जो ये काम कर रही हूं। मुझे और मेरे भाई को जब भी पढ़ाई से मौका मिलता है, यहां आ जाते हैं। कहते हुए मूर्ति को सजाने में व्यस्त हैं नौवीं कक्षा में पढ़ने वाली निवेदिता पाल। 



सात पीढ़ियां यानि 350 साल से अधिक हो गए हैं,  इस बार निवेदता के पिता पार्थो पाल देते हैं इस सवाल का जवाब। पार्थो पाल बताते हैं- हमारे पूर्वज नदिया जिले के कृष्णनगर और नवदीप से थे, उनको राजा-महाराजा यहां मां की मूर्तियां बनाने के लिए बुलाते थे। फिर जमींदारों के लिए मूर्तियां बनाई जाने लगीं। इसके बाद धीरे-धीरे जब जमींदार भी नहीं रहे तो स्थानीय लोगों के लिए मूर्तियां बनाई जाने लगीं। बार-बार आने-जाने में दिक्कत होती थी, इसलिए हमारे पूर्वज यहीं बस गए। 


कोलकाता में गंगा के किनारे बसे शिल्पकारों की एक छोटी सी बस्ती को आज दुनिया कुम्हार टुली के नाम से जानती है। दुनिया में जहां-जहां भी हिंदू खासतौर पर बंगाली हिंदू बसते हैं, दुर्गापूजा के समय यहीं से मां दुर्गा की मूर्तियां मंगवाते हैं। कोलकाता में होने वाली दुर्गापूजा का करीब 90 फीसदी मूर्तियों की आपूर्ति यहीं से होती है।

इस बार कुम्हार टुली के शिल्पकारों में उत्साह दोगुनी है। एक,  कोरोना के बाद इतने बड़े स्तर पर दुर्गापूजा का उत्सव मनाया जा रहा है और दूसरा है यूनेस्को ने बंगाल की दुर्गा पूजा को उन सांस्कृति धरोहरों की सूची में जगह दी है, जो अमूर्त हैं यानी भावनाओं पर आधारित हैं। कहते हुए माटूली मृत (मिट्टी) शिल्प संस्कृति समिति के संयुक्त सचिव रंजीत कुमार सरकार का चेहरा खुशी से खिल उठता है। इस बार दुर्गा पूजा का भव्य आयोजन देखने यूनेस्को की एक टीम भी आएगी कोलकाता। जैसा कि कुछ दिन पहले हमारी मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने घोषणा की। इस कारण हमारे ऊपर जिम्मेदारी और बढ़ गई है।

समिति के संयुक्त सचिव बाबू पाल कहते हैं, कोरोना काल में शिल्पकारों की आर्थिक स्थिति बहुत दयनीय रही। शिल्पकारों की रोजी-रोटी मूर्तियों पर निर्भर है, देखिए पहले गणेश पूजा, फिर विश्वकर्मा पूजा, इसके बाद दुर्गापूजा, फिर लक्ष्मी पूजा, फिर काली पूजा, इसके बाद जगधात्री पूजा, रास पूर्णिमा, सरस्वती पूजा फिर अन्नपूर्ण पूजा और इसके बाद वासंती पूजा। तो सोचिए, कोरोना काल में यहां के कारीगरों पर क्या गुजरी होगी।

इस बार हालात बदले हैं। करीब 400 शिल्पकार दिन-रात लग कर ऑर्डर पूरा किया। पहले जहां से 18 से 20 पीस के ऑर्डर आते थे, वहां से इस बार 80 से 85 पीस ऑर्डर मिले। मूर्तियों की कीमत 20 हजार से 2 लाख तक की होती है। इस बार 30 हजार से अधिक मूर्तियों का ऑर्डर कुम्हार टुली को मिला। शिल्पकारों के लिए यह एक अच्छा संकेत है।
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दुनिया में जहां-जहां भी बंगाली या हिंदू हैं, वे लगभग यहीं से मूर्तियां मंगवाते हैं, अमेरिका, कैनेडा, बैलजियम, यूके, बंग्लादेश, ऑस्ट्रेलिया, नीदरलैंड और श्रीलंका सहित बहुत से देशों से ऑर्डर आते हैं। विदेशों के लिए हम लोग 5 से 7 फीट की मूर्तियां बनाते हैं। विदेशों के जो भी ऑर्डर थे, वे सबसे पहले भेजे। इसके बाद फिर देश में भेजी जाने वाली मूर्तियों पर काम करते हैं।
देश के लिए मूर्तियां 12 फीट तक की बनाई जाती हैं।

पाल बताते हैं, कोलकाता में होने वाली दुर्गापूजा का करीब 90 फीसदी मूर्तियों की आपूर्ति यहीं से होती है। ये मूर्तियां पूरी तरह से इको-फ्रेंडली हैं। देसी तरीके से रंग बनाई जाती हैं। इसके लिए इमली और खरी का प्रयोग किया जाता है। नब कुमार कहते हैं, निवेदिता जैसे युवाओं के आने से हमारी मिट्टी की दुनिया डीजिटल की दुनिया में भी धूम मचाएगी और हमारी शिल्पकला को एक नया आयाम मिलेगा, ऐसी उम्मीद है।

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