आखिर क्यों एनकाउंटर को फर्जी साबित करना है मुश्किल, 3 साल में 74 जांच, सभी में यूपी पुलिस बरी

न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली  Updated Fri, 17 Jul 2020 05:53 PM IST
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Encounter - फोटो : iStock

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उत्तर प्रदेश में एक और दुर्दांत अपराधी मारा जा चुका है। आठ पुलिसकर्मियों को मारने वाला विकास दुबे अब इतिहास हो चुका है। मध्य प्रदेश के उज्जैन से पकड़ा गया विकास दुबे जिस ढंग से मारा गया, उस पर काफी सवाल उठ रहे हैं। 
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एक अपराधी जिसे मंदिर में एक निहत्था गार्ड दबोच लेता है, वो हथियारबंद पुलिसकर्मियों की गिरफ्त से निकल पड़ता है। मध्य प्रदेश से चली पुलिस की गाड़ी यूपी में आने के बाद अचानक बारिश में फिसल जाती है। और विकास दुबे पुलिस की बंदूक छीनकर भागने का प्रयास करता है। आत्मरक्षा में पुलिस को उस पर गोली चलानी पड़ती है। अब यह सच है या कहानी...ये तो जांच के बाद ही पता चल सकता है। 
मगर अब तक के एनकाउंटर की जांच के इतिहास पर नजर डालें तो हम पाएंगे कि किसी एनकाउंटर को फर्जी साबित करना बहुत ही मुश्किल काम है। कई मामलों में तो दशकों तक सच सामने नहीं आ पाता। आखिर क्यों किसी मुठभेड़ को फर्जी साबित करना इतना मुश्किल है, आइए जानते हैं... 
 
दशकों तक चलती रहती है जांच
  • एनकाउंटर फर्जी है या नहीं, इसे लेकर लंबी कानूनी प्रक्रिया चलती रहती है। कई मामलों की जांच तो दशकों तक चलती रहती है। 
  • पंजाब के दो पुलिसकर्मियों को सजा दिलाने के लिए सीबीआई की विशेष अदालत को 26 साल की मशक्कत करनी पड़ी। 
  • 1992 में इन पुलिसकर्मियों ने 15 साल के लड़के को फर्जी मुठभेड़ में मार दिया था।     
  • इसी तरह यूपी के 17 पुलिसकर्मियों को सजा दिलाने में 20 साल का समय लग गया। इन्होंने 1992 में ही 24 साल के युवक का एनकाउंटर किया था। 
  • दिल्ली के कनॉट प्लेस में 1997 में एक कारोबारी का एनकाउंटर कर दिया गया था। 10 पुलिसकर्मियों को दोषी साबित करने में एक दशक लंबी लड़ाई लड़नी पड़ी। 
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