कुरुक्षेत्र : जमीन पर सियासी तापमान से तय होगा आम चुनाव का टाइम टेबल

विनोद अग्निहोत्री, अमर उजाला, नई दिल्ली Updated Wed, 25 Jul 2018 03:48 PM IST
Time table for 2019 Lok Sabha elections will be decided by the political temperature on the ground
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संसद के भीतर विपक्ष गरम है और बाहर सड़कों पर जनता। विपक्ष सरकार की विफलताओं और राफेल सौदे को लेकर माहौल गरमा रहा है तो सरकार और भाजपा अपनी उपलब्धियों के साथ साथ हिंदुत्व की धार को लेकर सियासी तापमान चढ़ाने में जुटी है। संसद में अविश्वास प्रस्ताव में मिली जीत को अगर अपने पक्ष में माहौल बनाने में सरकार और भाजपा कामयाब हो जाती है तो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी आम चुनावों को लेकर देश को चौंका सकते हैं और अगर सियासी तापमान माकूल नहीं लगा तो चुनावों का टाइम टेबल जैसा है वैसा ही रहेगा।
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लोकसभा में विपक्ष के अविश्वास प्रस्ताव के दौरान राहुल गांधी के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को गले लगाने से लेकर अपने किसी सहयोगी सांसद को आंख मारकर इशारा करने को लेकर भाजपा और उसके समर्थकों ने कांग्रेस पर जितना जोरदार हमला किया और खुद प्रधानमंत्री ने अगले दिन उत्तर प्रदेश में अपनी एक जनसभा में कहा कि राहुल तो उनके गले पड़ गए, उसके आधे तेवर भी अगर सरकार ने अलवर में कथित गौ रक्षकों की भीड़ हिंसा से मारे गए रकबर की मौत को लेकर दिखाए होते तो निश्चित रूप से संसद के बाद देश की अमन पसंद जनता का विश्वास भी सरकार के प्रति और मजबूत हो जाता। लेकिन हर बार की तरह इस बार भी भीड़ हिंसा से निपटने की सारी जिम्मेदारी राज्य सरकारों पर छोड़कर सरकार आगे बढ़ना चाहती थी, लेकिन संसद में विपक्ष के दबाव के बाद सरकार ने उच्च स्तरीय समिति गठित करते हुए इस मामले में कानून बनाने की दिशा में कदम बढ़ा दिए।

 
2015 में जब उत्तर प्रदेश के दादरी में इसी तरह उन्मादी भीड़ ने कथित गोहत्या के विरोध में इकलाख की हत्या की थी, तो देश में एक बड़ा सियासी बवंडर खड़ा हो गया था। जहां सारे विपक्षी दल इसे लेकर भाजपा और संघ परिवार को कठघरे में खड़ा कर रहे थे, वहीं केंद्र सरकार इसे प्रदेश की तत्कालीन सपा सरकार की नाकामी बताकर गौ रक्षा के अपने एजेंडे को आगे बढ़ाते हुए हिंदुत्व की धार तेज करने में जुट गई थी।

याद होगा कि बिहार विधानसभा चुनाव तक में दादरी कांड को लेकर भाजपा नेताओं और गिरिराज सिंह जैसे केंद्रीय मंत्रियों ने हिंदुत्व की धार पर हिंदुओं के ध्रुवीकरण की पुरजोर कोशिश की, लेकिन लालू नीतीश के तत्कालीन सामाजिक समीकरण ने उसे सिरे नहीं चढ़ने दिया।

दादरी कांड के बाद भीड़ हिंसा की न जाने कितनी घटनाएं देश में हो चुकी हैं और शायद ही कोई राज्य इस तरह की हिंसा से अछूता हो। अकेले अलवर के मेवात इलाके में ही एसी चार घटनाएं हुईं। इसके अलावा झारखंड, महाराष्ट्र, कर्नाटक, गुजरात, उत्तर प्रदेश और पूर्वोत्तर में कहीं गाय को लेकर तो कहीं बच्चा चोरी के शक में भीड़ ने संदिग्धों की पीट पीट कर मार डाला या अधमरा कर दिया।

ऐसे मामलों में ज्यादार जगहों पर पुलिस की भूमिका पर भी सवाल उठे। मामला सर्वोच्च न्यायालय तक पहुंचा और अदालत ने भी इसे बेहद गंभीर मानते हुए राज्य सरकारों को एसी घटनाएं रोकने और केंद्र सरकार से भीड़ हिंसा को लेकर सख्त कानून बनाने को कहा। इसके बावजूद जिस तरह की सरकारी चुप्पी और लीपापोती भीड़ हिंसा को लेकर दिखाई देती है, और जिस तरह केंद्रीय मंत्रियों से लेकर संघ और भाजपा नेताओं के गैर जिम्मेदार बयान आए हैं, उससे साफ जाहिर है कि इन घटनाओं को लेकर सियासी और सामाजिक ध्रुवीकरण की राजनीति भी तेज होती जा रही है।
 

तमिलनाडु में भाजपा और अन्नाद्रमुक एक साथ आएं तो महाराष्ट्र में शिवसेना भाजपा की मुश्किलें बढाएगी

संसद में अविश्वास प्रस्ताव के दौरान जिस तरह राहुल गांधी समेत पूरा विपक्ष सरकार पर राफेल सौदा, किसानों की दुर्दशा, बेरोजगारी, महंगाई, महिला सुरक्षा और भीड़ हिंसा को लेकर एकजुट होकर हमलावर रहा और जिस चिरपरिचित अंदाज में सरकार और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की तरफ से विपक्ष को जवाब दिया गया, उससे साफ जाहिर है कि दोनों पक्षों ने आने वाले लोकसभा चुनावों की अपनी अपनी पटकथा तैयार कर ली है।

अविश्वास प्रस्ताव के विरोध में अन्नाद्रमुक को सरकार का समर्थन और शिवसेना द्वारा प्रस्ताव की बहस का बहिष्कार ये संकेत दे गया कि तमिलनाडु में भाजपा और अन्नाद्रमुक एक साथ आएंगे तो महाराष्ट्र में शिवसेना भाजपा की मुश्किलें बढाएगी। इसीलिए भाजपा अध्यक्ष अमित शाह ने मुंबई में पार्टी कार्यकर्ताओं से साफ कह दिया कि गठबंधन की चिंता छोड़कर अकेले चुनाव लड़ने की तैयारी करें। दूसरी तरफ बीजद और टीआरएस जैसे दलों ने अविश्वास प्रस्ताव पर जो तटस्थता दिखाई, उससे यह साफ हो गया कि ये दल मौके के हिसाब से अपने फैसले लेंगे। कोई भी पक्ष इनके समर्थन का दावा अभी नहीं कर सकता।

राफेल विमान सौदा अब उसी तरह लोगों के बीच चर्चा का मुद्दा बनता जा रहा है जैसे कभी राजीव गांधी के खिलाफ बोफोर्स सौदा बना था। लेकिन फर्क ये है कि बोफोर्स के आरोपों को धार तब मिली थी जब सरकार से बाहर निकलकर तत्कालीन वित्त मंत्री विश्वनाथ प्रताप सिंह ने राजीव गांधी को कठघरे में खड़ा किया था, जबकि राफेल में अभी तक आरोप विपक्ष लगा रहा है और पूरी सरकार बचाव कर रही है। लेकिन जिस तरह गोपनीयता के करार की आड़ में सरकार राफेल विमानों की कीमत और अन्य जानकारियां जो गोपनीयता करार के दायरे में नहीं आती हैं, सार्वजनिक नहीं कर रही है, उससे विपक्ष को सवाल उठाने का मौका मिल गया है।

ऐसे में सरकार की यह सफाई लोगों के गले नहीं उतर रही है कि क्योंकि फ्रांस के साथ इस सौदे को लेकर गोपनीयता करार है, इसलिए कीमत की जानकारी देना मुमकिन नहीं है। क्योंकि खुद राज्यसभा में रक्षा राज्य मंत्री एक बार कीमत बता चुके हैं और बाद में निर्माता कंपनी की बेवसाइट पर भी कीमत का ब्यौरा दिया जा चुका है। विपक्ष के आरोपों का यही बड़ा आधार है।

मराठा आरक्षणः आंदोलन की आग से मुंबई और पुणे लगे झुलसने

महाराष्ट्र में मराठा आरक्षण का मुद्दा उसी तरह गरम है जैसे कुछ साल पहले गुजरात में पटेल और हरियाणा में जाट आरक्षण का मुद्दा गरम था। आरक्षण की मांग को लेकर मराठा समुदाय के नौजवान सड़कों पर हैं। अपनी मांग पर जोर देने के लिए औरंगाबाद में एक आंदोलनकारी द्वारा नदी में कूद कर जान देने से मामला और तूल पकड़ गया। 

आंदोलन की आग इतनी तेज फैल गई है कि मुंबई और पुणे भी इसकी गरमी में झुलसने लगे हैं। यहां तक कि हर साल पंढरपुर में होने वाली भगवान विट्ठल की यात्रा के बाद पूजा पर मुख्यमंत्री के जाने की परंपरा भी टूट गई और मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस वहां नहीं जा सके। दरअसल मराठा, जाट, पटेल आदि जातियां अपने अपने प्रभाव वाले राज्यों में दशकों से आर्थिक, सामाजिक और राजनीतिक रूप से दबदबे वाली रही हैं। लेकिन पिछले एक डेढ़ दशक से इन दबंग जातियों का वर्चस्व घटा और शासन की बागडोर अन्य जातियों के पास चली गई।

गुजरात में केशूभाई पटेल के बाद कोई पटेल मुख्यमंत्री नहीं बना। हरियाणा में देवीलाल, बंसीलाल, चौटाला और हुड्डा के बाद अब गैर जाट मनोहर लाल खट्टर मुख्यमंत्री हैं और इसी तरह महाराष्ट्र में गैर मराठा देवेंद्र फडणनवीस मुख्यमंत्री हैं।

इसलिए इन दबंग जातियों ने अलग अलग समय पर अपने अपने प्रभाव क्षेत्रों में आरक्षण के मुद्दे पर अपनी ताकत दिखानी शुरू कर दी है। इसके साथ ही किसानों का असंतोष, रोजगार के मोर्चे पर कुछ खास न होने, अर्थव्यवस्था की सुस्ती और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की तमाम कल्याणकारी योजनाओं का जमीन पर पूरी तरह अमल न हो पाने और इन मुद्दों पर विपक्ष की घेराबंदी ने सरकार और भाजपा के साथ साथ उसके नीति और विचार प्रतिष्ठान राष्ट्रीय स्वंयसेवक संघ को भी बेचैन कर दिया है। 
 

अब एकमात्र रास्ता हिंदुत्व ही बचा है

लोकसभा चुनाव और उनके पहले तीन महीने बाद होने वाले चार राज्यों के विधानसभा चुनाव की चुनौती का मुकाबला करने के लिए अब एकमात्र रास्ता हिंदुत्व ही बचा है। अयोध्या के राम मंदिर मामले की सुनवाई सर्वोच्च न्यायालय में चल रही है। विश्व हिंदू परिषद समेत सभी हिंदुवादियों का दबाव बढ़ रहा है।

सरकार चाहती है कि अदालत से इस मुद्दे का कोई मान्य हल निकल आए। इसलिए जब भी कोई मौका मिलता है भाजपा के कुछ नेता और सरकार के कुछ चुनींदा मंत्री अपने बयानों से हिंदुत्व की धार तेज करके हिंदुओ के ध्रुवीकरण का तीर चलाने से नहीं चूकते हैं। लेकिन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी सिर्फ हिंदुत्व पर ही अपने चुनाव अभियान को आधारित नहीं करना चाहते हैं।

वह अपने विकास, सुशासन और गरीब बनाम अमीर की लड़ाई को भी धार देना चाहते हैं। इसकी झलक संसद में उनके अविश्वास प्रस्ताव के जवाब में दिए गए भाषण और फिर उसके बाद उत्तर प्रदेश के शाहजहां पुर की जनसभा में किए संबोधन में मिलती है जब वह कहते हैं कि मैं तो गरीबों के घरों में बिजली पहुंचा रहा हूं और वो मेरे खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव ला रहे हैं।

प्रधानमंत्री के भाषणों और हिंदुत्ववादी बयानों के जरिए सरकार जमीन पर सामाजिक तापमान मापने में जुटी है। अगर माहौल उनके हिसाब से गरम हुआ तो मुमकिन है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी नोटबंदी की तर्ज पर आम चुनावों को लेकर भी कोई चौंकाने वाला फैसला ले सकते हैं। वरना अक्टूबर नवंबर 2018 और फिर अप्रैल मई 2019 में तो सरकार और विपक्ष के बीच चुनावी सेमीफाइनल और फाइनल मुकाबले तो तय हैं ही।
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