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तीन बार की मुख्यमंत्री शीला दीक्षित दूसरी राजनीतिक पारी में पराई दिखीं

अनूप वाजपेयी, नई दिल्ली Updated Sat, 20 Jul 2019 09:52 PM IST
शीला दीक्षित
शीला दीक्षित - फोटो : Amar Ujala
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दिल्ली की तीन बार मुख्यमंत्री रहीं शीला दीक्षित अपनी दूसरी राजनीतिक पारी में अपनों के बीच पराई रहीं। पार्टी में उनका कद और 10 जनपथ तक पैठ ने उन्हें उम्र के इस पड़ाव में दूसरी राजनीतिक पारी के लिए दो अहम मौके दिए। पार्टी जो करिश्मा उनके नेतृत्व में देखना चाह रहा था दोनों बार अंजाम तक नहीं पहुंचा। आखिरी वक्त में उन्हें अपनों से ही बार-बार गिरते स्वास्थ्य और भूलने को लेकर लग रहे आरोपों पर कई बार सफाई देनी पड़ी। दिल्ली के प्रभारी पीसी चाको की तीन दिन पहले मिली आखिरी चिट्ठी भी शायद उनका मनोबल तोड़ने और राजनीतिक झटका देने के लिए काफी थी। इसी मार्च में उन्होंने 80 साल पूरे किए थे। 

यूपी चुनाव के बाद घर बैठा दिया

कांग्रेस नेतृत्व ने शीला दीक्षित की क्षमताओं को देखते हुए ही यूपी की राजनीति से दिल्ली लाकर चुनाव लड़ाया और उन्होंने खुद को स्थापित करके दिखाया। 2014 में दिल्ली हारने के बाद शीला दीक्षित ने खुद को राजनीतिक तौर पर समेट लिया था। 2017 को यूपी विधानसभा चुनाव के लिए कांग्रेस के सामने ऐसा कोई चेहरा नहीं था जिसे आगे करके चुनाव लड़ा जाए। कांग्रेस नेतृत्व ने शीला दीक्षित को यूपी की सीएम उम्मीदवार के तौर पर पेश किया। पार्टी उनके माध्यम से यूपी के ब्राह्मण मतदाताओं, विकास करने वाली महिला की छवि और अनुभव को भुनाना चाहता था। शीला दीक्षित ने यूपी में बस से दौरा भी शुरू कर दिया था लेकिन गठबंधन की राजनीति में उन्हें अपने पैर खींचने पड़े और पार्टी ने भी अपनी इस नेता को घर बैठा दिया। 

उनके भूल जाने के तंज खुलेआम सुनाई देने लगे

कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने इस साल जनवरी में शीला दीक्षित को एक बार फिर अगुवाई का मौका दिया। तीन कार्यकारी अध्यक्षों के साथ शीला दीक्षित को दिल्ली प्रदेश कांग्रेस कमेटी का अध्यक्ष बनाया। इस बार शीला जब दिल्ली लौटीं तो उनके अपने भी पराये थे और उन्हें भुला दिया था। उनके नेतृत्व पर सवाल उठाने और अक्षम साबित करने के लिए पार्टी के भीतर से ही उनके भूल जाने के तंज खुलेआम सुनाई दे रहे थे। हर बार उन्होंने इसका जवाब भी दिया। पार्टी के बाहर भी विरोधियों के बीच उनकी छवि पर भूलने के दाग लगा रही थी। 

अपनों ने खींची तलवारें

लोकसभा चुनाव से पहले शीला ने संगठन को कसने के लिए कुछ फेरबदल किए जिसके बाद उनके करीबी रहे राजकुमार चौहान पार्टी छोड़कर भाजपा में चले गए। शीला दीक्षित के अड़े रहने के कारण ही दिल्ली में आप के साथ गठबंधन नहीं हुआ। पार्टी के तमाम नेताओं ने उन्हें कोसा जरूर लेकिन लोकसभा चुनाव में पार्टी आगे बढ़ती हुई दिखी। निधन के तीन दिन पहले दिल्ली प्रभारी पीसी चाको ने चिट्ठी लिखकर कर कहा कि आपकी सेहत ठीक नहीं है ऐसे में तीनों कार्यकारी अध्यक्ष स्वतंत्र रूप से काम करेंगे और बैठक बुलाएंगे। शीला दीक्षित ने अगले दिन ही चाको को जवाब देते हुए तीन कार्यकारी अध्यक्षों के कामकाज का बंटवारा कर दिया। ये फैसला उनकी दूसरी राजनीतिक पारी का आखिरी फैसला रहा लेकिन इस साल के अंत विधानसभा चुनाव से पहले ही भूल जाने के आरोपों में घिरीं शीला दीक्षित अब यादों में रहेंगी। 
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