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बदहाल थिएटर: कलाकार बोले- जब सिनेमाहॉल खुल सकते हैं तो ऑडिटोरियम क्यों नहीं, रंगकर्मियों को आर्थिक मदद दे सरकार

Atul sinha अतुल सिन्हा
Updated Sat, 23 Oct 2021 07:37 PM IST
सार

जाने माने कलाकार एमके रैना बताते हैं कि वे हाल ही में कश्मीर से एक प्रोजेक्ट करके वापस लौटे हैं। लेकिन उनकी नजर में दिल्ली और आसपास के रंगमंच की हालत बेहद खस्ता है। केजरीवाल सरकार संस्कृति और कलाकारों की बातें तो बहुत करती है लेकिन अभी तक ऑडिटोरियम नहीं खोले गए हैं और न ही डीसीपी ऑफिस परफॉर्मेंस लाइसेंस दे रहा है...

थिएटर
थिएटर - फोटो : अमर उजाला (फाइल फोटो)
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विस्तार

कोरोना काल की दहशत और पाबंदियों के बाद कला जगत में हलचल अब शुरू हो रही है। दिल्ली की कुछ आर्ट गैलरी में पेंटिंग प्रदर्शनियां आयोजित होने लगी हैं, लेकिन अभी नाटक, नृत्य या संगीत से जुड़े परफॉर्मिंग आर्ट के कार्यक्रमों के लिए इजाजत नहीं दी जा रही है। आने वाले दिनों में अगर इजाजत मिल भी जाए तो थिएटर ग्रुप्स या संस्थाएं आर्थिक तौर पर इतनी बदहाल हो चुकी हैं कि उनके लिए ऑडिटोरियम बुक करना और बाकी खर्च उठाना फिलहाल आसान नहीं है।

डिलीवरी बॉय तक बने कलाकार

थिएटर की दुनिया के जो बड़े नाम हैं और जिन्हें लॉकडाउन के दौरान भी कुछ न कुछ सरकारी प्रोजेक्ट मिलते रहे हैं, उनके लिए बड़े ऑडिटोरियम का न खुलना या बंद रहना खास मायने नहीं रखता। लेकिन उनके साथ जुड़े जो कलाकार हैं और जो अपनी परफॉर्मेंस के बलबूते जीते हैं, वे बदहाली के कगार पर हैं। इनमें से कई तो तमाम ऑनलाइन कंपनियों के लिए डिलीवरी बॉय तक का काम करने लगे हैं।



जाने माने कलाकार एमके रैना बताते हैं कि वे हाल ही में कश्मीर से एक प्रोजेक्ट करके वापस लौटे हैं। लेकिन उनकी नजर में दिल्ली और आसपास के रंगमंच की हालत बेहद खस्ता है। केजरीवाल सरकार संस्कृति और कलाकारों की बातें तो बहुत करती है लेकिन अभी तक ऑडिटोरियम नहीं खोले गए हैं और न ही डीसीपी ऑफिस परफॉर्मेंस लाइसेंस दे रहा है। मुंबई, पुणे में ये स्थिति नहीं है। वहां ऑडिटोरियम खुल गए हैं। जब आप सिनेमाहॉल खोल सकते हैं तो थिएटर क्यों नहीं।

हॉल बुक करने के लिए पैसे नहीं

दिल्ली और मुंबई के सबसे बड़े थिएटर ग्रुप अस्मिता के संस्थापक और वरिष्ठ रंगकर्मी अरविंद गौड़ कहते हैं कि अगर ऑडिटोरियम खुल भी जाएं तो कलाकारों या संस्थाओं के पास पैसा कहां है जो वे इतने महंगे हॉल बुक करें। तमाम नाट्य संस्थाएं बिखर गईं, उनके पास कलाकार नहीं बचे। कई रोजी-रोटी की तलाश में वापस गांव या घर चले गए, तो कोई यहां रहकर भी जीने के लिए डिलीवरी बॉय से लेकर कुछ छोटे मोटे काम करने लगा। सरकार ने ऐसे मुश्किल वक्त में कलाकारों के लिए कुछ नहीं किया। कम से कम उन्हें कुछ आर्थिक मदद तो मिलनी ही चाहिए थी, ताकि अपनी कला को ज़िंदा रख सकें।


अरविंद का कहना है कि अब हमें आगे की सोचना चाहिए और कैसे फिर से कलाकारों और संस्थाओं को जीवित किया जाए, इस बारे में ठोस योजना बनानी चाहिए। अस्मिता तो ऐसे वक्त में भी लगातार अपने परिसर में ही नाटक कर रहा है और कलाकारों को वर्कशॉप के साथ प्रशिक्षण भी दे रहा है। हम चाहते हैं कि जो भी कलाकार या संस्था काम करना चाहती हैं, हम उसे जगह उपलब्ध कराएंगे। कलाकारों और संस्थाओं को बड़े ऑडिटोरियम का वर्चस्व तोड़ना होगा। कम संसाधन और उपलब्ध जगह में काम करने की परंपरा शुरू करनी होगी।

रामलीला में मात्र 60-70 दर्शक

श्रीराम भारतीय कला केंद्र में रामलीला हो रही है, लेकिन पहले जैसी रौनक नहीं है। ऑडिटोरियम के बाहर खुले में हो रही इस पारंपरिक रामलीला में इफेक्ट पहले जैसे नहीं हैं, लेकिन कलाकारों में थोड़ा उत्साह जरूर आया है। दर्शक भी आम तौर पर 60-70 आ जाते हैं।

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अक्षरा थिएटर में शनिवार और इतवार को आरएस रघु के निर्देशन में नाटक और कब तक का शो है। अक्षरा थिएटर के ध्रुव शेट्टी के मुताबिक यहां पिछले महीने से शो हो रहे हैं और करीब 50 दर्शक आ रहे हैं। इसके लिए हमे परमिशन मिलने में मुश्किल नहीं आ रही। लेकिन हम कम से कम किसी एक नाटक के दो शो के लिए ही हॉल दे रहे हैं।

जाहिर है मुश्किलें तमाम हैं, लेकिन रंगमंच और कला जगत एक बार फिर पुराने दिनों की तरह लौटने की आस लगाए बैठा है। बेशक इसके लिए सरकार और बड़ी संस्थाओं के साथ बड़े कॉरपोरेट समूहों को मदद करनी होगी ताकि कलाकारों के भीतर हौसला भरा जा सके।

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