चंद्रयान-2: क्या यह सच है कि रोवर चांद की सतह पर तिरंगे की छाप छोड़ेगा

रिसर्च डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: अनिल पांडेय Updated Fri, 06 Sep 2019 07:08 PM IST

सार

  • रात 1:40 बजे चंद्रयान ठीक 90 डिग्री पर उतरना शुरू करेगा।
  • करीब 1:55 बजे दो क्रेटर के बीच लैंड करेगा। इसके दो घंटे बाद 3:55 बजे लैंडर का रैंप खुलेगा।
  • सुबह 5:55 बजे रोवर (प्रज्ञान) लैंडर (विक्रम) से बाहर आकर चांद पर उतरेगा।
  • इसकी तस्वीरें इसरो को शनिवार सुबह 11 बजे मिलेंगी।
विक्रम लैंडर
विक्रम लैंडर - फोटो : isro
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विस्तार

अमेरिका, रूस और चीन के बाद भारत चांद की सतह पर पहुंचने वाला दुनिया का चौथा देश बनेगा। चंद्रयान-2 दुनिया का पहला ऐसा यान है, जो चांद के दक्षिणी ध्रुव पर उतरेगा। इससे पहले चीन के चांग'ई-4 यान ने दक्षिणी ध्रुव से कुछ दूरी पर लैंडिंग की थी। अब तक यह क्षेत्र वैज्ञानिकों के लिए अनजान बना हुआ है।
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चंद्रयान-2 चांद के दक्षिणी ध्रुव पर मैग्नीशियम, कैल्शियम और लोहे जैसे खनिजों को खोजने का प्रयास करेगा। वह चांद के वातावरण और इसके इतिहास पर भी डाटा जुटाएगा। चंद्रयान-2 का सबसे खास मिशन वहां पानी या उसके संकेतों की खोज होगी।

 

अगर चंद्रयान-2 यहां पानी के सबूत खोज पाता है तो यह अंतरिक्ष विज्ञान के लिए एक बड़ा कदम होगा। पानी और ऑक्सीजन की व्यवस्था होगी तो चांद पर बेस कैम्प बनाए जा सकेंगे, जहां चांद से जुड़े शोधकार्य के साथ-साथ अंतरिक्ष से जुड़े अन्य मिशन की तैयारियां भी की जा सकेंगी। अंतरिक्ष एजेंसियां मंगल ग्रह तक पहुंचने के लिए चांद को लॉन्च पैड की तरह इस्तेमाल कर पाएंगी। इसके अलावा यहां पर जो भी मिनरल्स होंगे, उनका भविष्य के मिशन में इस्तेमाल कर सकेंगे।

अमेरिका की अंतरिक्ष एजेंसी नासा भी दक्षिणी ध्रुव पर जाने की तैयारी कर रही है। 2024 में नासा चांद के इस हिस्से पर अंतरिक्ष यात्रियों को उतारेगा। जानकारों का मानना है कि नासा की योजना का बड़ा हिस्सा चंद्रयान-2 की कामयाबी पर टिका है।

चांद की सतह पर भारत की छाप


 
शनिवार तड़के जब चंद्रयान-2 चांद की सतह से 35 किमी पर होगा, तब नीचे लगे पांचों इंजन चालू कर दिए जाएंगे। अंतिम समय में गति शून्य कर दी जाएगी और यह बिना हलचल के चंद्रमा पर उतर जाएगा। रोवर में छह पहिये हैं, जिनकी मदद से यह चंद्रमा की सतह पर चलेगा। इसके पीछे के दो पहियों में क्रमशः अशोक चक्र और इसरो का प्रतीक चिन्ह उभरा हुआ है, जिससे चांद की जमीन पर इसके निशान छप जाएंगे। वहीं विक्रम लैंडर के रैंप पर भारत का तिरंगा झंडा बना हुआ है। रोवर के चंद्रमा की जमीन पर उतरते ही वह लैंडर और लैंडर रोवर की सेल्फी लेगा।


 

विक्रम और प्रज्ञान नाम क्यों रखा गया?

इसरो ने अपने लैंडर का नाम विक्रम रखा गया है क्योंकि इस संस्कृत शब्द का अर्थ साहस और वीरता से जुड़ा है। लैंडर का नाम विक्रम रखने के पीछे एक मकसद वैज्ञानिक विक्रम साराभाई को श्रद्धांजलि देना भी है। विक्रम साराभाई को भारतीय अंतरिक्ष विज्ञान कार्यक्रमों का जनक भी कहा जाता है। 

इसरो और इसके वैज्ञानिक भारत की परंपरा को भी मानते हैं। हमारी भाषा संस्कृत से उन्होंने प्रज्ञान नाम लिया है। इसका अर्थ होता है 'बुद्धिमता'। प्रज्ञान रोवर को चंद्रमा की सतह पर अपनी बुद्धिमता का परिचय देना है। वहां कई चीजों का पता लगाना है।

क्या है लैंडर विक्रम और क्या करेगा?

चंद्रयान-2 में एक ऑर्बिटर के साथ एक लैंडर और एक रोवर भी गया है। चंद्रमा तक पहुंचकर ऑर्बिटर से लैंडर अलग हो जाएगा और चंद्रमा की 30 किमी गुणित 100 किलोमीटर की कक्षा की तरफ निकलेगा। इसके बाद लैंडर अपने ऑन बोर्ड सिस्टम के जरिए पूरी चेकिंग करेगा और सॉफ्ट लैंडिंग के बाद रोवर को तैनात करेगा। करीब 15 दिनों तक लैंडर चंद्रमा से जुड़ी वैज्ञानिक गतिविधियों को अंजाम देगा। इस लैंडर की एक खूबी ये भी है कि 12 डिग्री तक झुकाव वाली सतह पर भी यह सॉफ्ट लैंडिंग कर सकेगा।

रोवर प्रज्ञान क्या करेगा?

लैंडर विक्रम चंद्रमा की सत्ह पर रोवर प्रज्ञान को लॉन्च करेगा, जो सौर शक्ति से संचालित होगा। ये रोवर 6 पहियों पर चलेगा और 1 सेंटीमीटर प्रति सेकंड की रफ्तार से बढ़ते हुए करीब 500 मीटर की दूरी तय करेगा। रोवर सतह पर केमिकल विश्लेषण को अंजाम देगा और ये डाटा लैंडर को भेजेगा। लैंडर के जरिए ये डाटा इसरो के अंतरिक्ष स्टेशन तक पहुंचेगा। रोवर प्रज्ञान चंद्रमा के एक दिन या पृथ्वी के हिसाब से 14 दिनों तक सक्रिय रहेगा।

चंद्रयान-2 कब लॉन्च हुआ था?

चंद्रयान-2 को भारत के सबसे ताकतवर जीएसएलवी मार्क-III रॉकेट से लॉन्च किया गया था। इस रॉकेट में तीन मॉड्यूल ऑर्बिटर, लैंडर (विक्रम) और रोवर (प्रज्ञान) थे। चंद्रयान-2 का वजन 3,877 किलो था। यह चंद्रयान-1 मिशन (1380 किलो) से करीब तीन गुना ज्यादा था। एक बार तकनीकी खराबी आने के बाद यह मिशन 22 जुलाई को लॉन्च हुआ।

लॉन्चिंग का समय चुनने के लिए लंबी कैलकुलेशन होती है। पृथ्वी और चांद का मूवमेंट ध्यान में रखा जाता है। चंद्रयान-2 के मामले में पृथ्वी और चांद के ऑर्बिट में घूमने से लेकर लैंडिंग में लगने वाले हर समय की गणना की गई। यान ने 23 दिन पृथ्वी के चक्कर लगाए। इसके बाद चंद्रमा की कक्षा में पहुंचने में इसे 6 दिन लगे।

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