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गोरक्षा पर हिंसा की इजाजत नहीं दे सकती है सरकार, संसद जल्द बनाए कानून: सुप्रीम कोर्ट

न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली Updated Tue, 17 Jul 2018 11:29 AM IST
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गोरक्षा के नाम पर भीड़ द्वारा हिंसा को रोकने के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने आज अपना फैसला सुनाया है। कोर्ट ने अपने फैसले में संसद को कानून बनाने को कहा है। कोर्ट ने कहा कि भीड़ तंत्र की इजाजत नहीं दी जा सकती है। शांति स्थायित्व करना केंद्र का दायित्व है। साथ ही कहा कि भीड़ की हिंसा में शिकार पीड़ितों को मुआवजा मिले। कोर्ट ने कहा कि 20 अगस्त को हालात की समीक्षा की जाएगी।


इस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र और राज्य सरकारों को मॉब लिंचिंग की घटनाएं रोकने के लिए दिशानिर्देश जारी किए है। दिए निर्देश केंद्र और राज्य सरकारों को चार हफ्ते के भीतर लागू करने होंगे। कोर्ट ने कहा कि किसी को भी अपने हाथ में कानून लेने का अधिकार नहीं है। इसलिए राज्य सरकारों का फर्ज है कि वो कानून व्यवस्था बनाये रखें। 


कोर्ट ने कहा कि संसद को ऐसा कानून बनाना चाहिए जिसमें सजा का प्रावधान हो। इस मामले में सुप्रीम कोर्ट अगस्त में अलगी सुनवाई करेगा। कोर्ट ने कहा कि यह गंभीर मुद्दा है इसलिए इससे गंभीरता से निपटना होगा। 

बता दें कि इस मामले में सुप्रीम कोर्ट में एक याचिका दाखिल की गई थी। जिसपर आज सुनवाई हुई है। इससे पहले सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने राज्य सरकारों को फटकार लगायी थी। कोर्ट ने कहा था कि गोरक्षा के नाम पर हो रही हिंसा को राज्य सरकारों को रोकना चाहिए। क्योंकि अदालत यह स्वीकार नहीं कर सकती है कि कोई भी कानून को हाथ में ले। 

कोर्ट ने कहा था कि कानून व्वस्था प्रत्येक राज्य की जिम्मेदारी है। हिंसा को रोकने के लिए राज्यों सरकारों को कड़े कदम उठाने चाहिए। बता दें कि सुप्रीम कोर्ट ने गोरक्षा करने वालों पर बैन की मांग वाली याचिका पर भी सुनवाई की थी। इस दौरान कोर्ट ने 6 राज्यों उत्तर प्रदेश, गुजरात, राजस्थान, महाराष्ट्र, झारखंड और कर्नाटक को नोटिस जारी कर जवाब दाखिल करने को कहा था। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि ऐसी हिंसा को रोकने के लिए सख्त कदम उठाए जाने जरूरी हैं।

यह कानून एवं व्यवस्था का मामला है, इसकी जिम्मेदारी संबंधित राज्यों की है

गाय
गाय - फोटो : self
मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्रा, न्यायाधीश एएम खानविलकर और डीवाई चंद्रचूड़ की पीठ ने कहा था कि यह कानून एवं व्यवस्था का मामला है और इसकी जिम्मेदारी संबंधित राज्यों की है। पीठ ने कहा कि वह इस मामले में एक विस्तृत फैसला सुनाएगी। सुनवाई के दौरान पीठ ने कहा कि हिंसा की घटनाएं वास्तव में भीड़ हिंसा के मामले हैं, जो कि अपराध है। 

अतिरिक्त सॉलीसिटर जनरल पीएस नरसिम्हा ने कहा कि केंद्र इन मामलों पर नजर बनाए हुए है और इन पर लगाम लगाने की भी कोशिशें कर रहा है। उन्होंने कहा कि सबसे बड़ी समस्या कानून एवं व्यवस्था को बनाए रखने की है। वहीं पीठ ने कहा कि किसी को भी कानून अपने हाथ में लेने की इजाजत नहीं है और ऐसी घटनाओं पर लगाम लगाने की जिम्मेदारी राज्यों की है।

पिछले साल 6 सितंबर को सुप्रीम कोर्ट ने सभी राज्यों से कहा था कि वे गोरक्षा के नाम पर हिंसा को रोकने के लिए सख्त कदम उठाएं। इसके बाद महात्मा गांधी के परपोते तुषार गांधी ने कोर्ट में एक अवमानना याचिका दाखिल की। याचिका में उन्होंने हरियाणा, राजस्थान और उत्तर प्रदेश पर कोर्ट के आदेश का पालन न करने का आरोप लगाया।
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