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Hindi News ›   India News ›   Succession right of Tribal women: Supreme Court directs Centre to consider On Hindu Succession Act

सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी: जब गैर-आदिवासी लड़कियां पिता की संपत्ति की हकदार, तो आदिवासी बेटियां क्यों नहीं?

पीटीआई, नई दिल्ली Published by: संजीव कुमार झा Updated Fri, 09 Dec 2022 09:46 PM IST
सार

शीर्ष अदालत ने कहा कि जब गैर-आदिवासी की बेटी अपने पिता की संपत्ति में समान हिस्से की हकदार है, तो आदिवासी समुदायों की बेटी को इस तरह के अधिकार से वंचित करने का कोई कारण नहीं है।

सुप्रीम कोर्ट
सुप्रीम कोर्ट - फोटो : PTI

विस्तार

आदिवासी महिलाओं को उत्तराधिकार देने के मामले पर आज सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई हुई। सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को केंद्र सरकार को इस मुद्दे की जांच करने और हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम के प्रावधानों में संशोधन करने पर विचार करने का निर्देश दे दिया है।  शीर्ष अदालत ने कहा कि जब गैर-आदिवासी की बेटी अपने पिता की संपत्ति में समान हिस्से की हकदार है, तो आदिवासी समुदायों की बेटी को इस तरह के अधिकार से वंचित करने का कोई कारण नहीं है। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि भारत के संविधान, जिसके तहत समानता के अधिकार की गारंटी है, के 70 वर्षों की अवधि के बाद भी आदिवासियों की बेटी को समान अधिकार से वंचित किया जा रहा है। केंद्र सरकार के लिए इस मामले को देखने का सही समय है और यदि आवश्यक हो, हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम के प्रावधानों में संशोधन करे।



जानें क्यों उठ रहा सवाल
दरअसल, हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम की धारा 2(2) के अनुसार, हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम अनुसूचित जनजाति के सदस्यों पर लागू नहीं होता है। ऐसे में अनुसूचित जनजाति की बेटियां पिता की संपत्ति की हकदार बनने से वंचित रह जाती हैं। जस्टिस एमआर शाह और जस्टिस कृष्ण मुरारी की पीठ ने कहा कि जहां तक अनुसूचित जनजाति की महिला सदस्यों का संबंध है, उत्तरजीविता के अधिकार (किसी व्यक्ति के संयुक्त हित वाले व्यक्ति की मृत्यु पर संपत्ति का अधिकार) से इनकार करने का कोई औचित्य नहीं है। 


भारत सरकार  अनुच्छेद- 14 और 21 के तहत विचार करेगी
जस्टिस एमआर शाह और जस्टिस कृष्ण मुरारी की पीठ ने कहा कि जहां तक अनुसूचित जनजाति की महिला सदस्यों का संबंध है, उत्तरजीविता के अधिकार ( संयुक्त हित वाले व्यक्ति की मृत्यु पर किसी व्यक्ति का संपत्ति का अधिकार) से इनकार करने का कोई औचित्य नहीं है। पीठ ने कहा  कि केंद्र सरकार को यह निर्देश दिया जाता है कि वह हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम के तहत दिए गए अपवाद को वापस लेने पर विचार करे। पीठ ने कहा कि हमें आशा और विश्वास है कि केंद्र सरकार इस मामले को देखेगी और भारत के संविधान के अनुच्छेद- 14 और 21 के तहत गारंटीकृत समानता के अधिकार को ध्यान में रखते हुए उचित निर्णय लेगी। 

वर्तमान परिदृश्य में पिता की संपत्ति में पुत्री को लाभ नहीं देने को  उचित नहीं ठहराया जा सकता
शीर्ष अदालत का यह निर्देश उस याचिका को खारिज करने के फैसले में आया है कि क्या अनुसूचित जनजाति से संबंधित एक बेटी, हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम के प्रावधानों के तहत सर्वाइवरशिप के आधार पर अधिग्रहित भूमि के संबंध में मुआवजे में हिस्सेदारी की हकदार है। सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि यद्यपि हमारी प्रथम दृष्टया यह राय है कि पिता की संपत्ति में पुत्री को उत्तरजीविता का लाभ नहीं देना कानून की दृष्टि से बुरा कहा जा सकता है और वर्तमान परिदृश्य में इसे उचित नहीं ठहराया जा सकता। लेकिन जब तक हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम की धारा- 2(2)  में संशोधन नहीं किया जाता है तब तक अनुसूचित जनजाति के सदस्य होने वाले पक्ष हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम की धारा 2 (2) द्वारा शासित होंगे।

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