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दायित्व: बेटे को 'चौधराने' की जिम्मेदारी दे गए अजित सिंह, जयंत के कंधों पर दादा की विरासत का भी भार

शशिधर पाठक, डिजिटल ब्यूरो, अमर उजाला Published by: दीप्ति मिश्रा Updated Sat, 08 May 2021 11:38 AM IST

सार

पिता अजित सिंह के इस दुनिया से जाने के बाद जयंत पर पूरे 'जाटलैंड' को संभालने और पार्टी को मजबूत करने की जिम्मेदारी आ गई। इतना ही नहीं जयंत के कंधों पर अपने दादा पूर्व प्रधानमंत्री स्व. चौधरी चरण सिंह की विरासत को संभालने, अजगर (अहिर, जाट, गुर्जर, राजपूत) को पुनर्जीवित करने की भी जिम्मेदारी है।
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जयंत सिंह
जयंत सिंह - फोटो : अमर उजाला

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विस्तार

राष्ट्रीय लोकदल के उत्तराधिकारी चौधरी जयंत सिंह के लिए पिता चौधरी अजित सिंह  बरगद की तरह थे, लेकिन 6 मई को कोरोना संक्रमण उन्हें निगल गया। पिता अजित सिंह के इस दुनिया से जाने के बाद जयंत पर पूरे 'जाटलैंड' को संभालने और पार्टी को मजबूत करने की जिम्मेदारी आ गई। इतना ही नहीं जयंत के कंधों पर अपने दादा पूर्व प्रधानमंत्री स्व. चौधरी चरण सिंह की विरासत को संभालने, अजगर (अहिर, जाट, गुर्जर, राजपूत) को पुनर्जीवित करने की भी जिम्मेदारी है।
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जयंत सिंह के जिम्मे यह चुनौती ऐसे समय में आई है, जब मुकाबले में उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव 2017 में 325 सीट जीतने वाली भाजपा और उनके दादा की विरासत पर कब्जा जमा चुकी समाजवादी पार्टी है। समाजवादी पार्टी की कमान अब पूरी तरह से मुलायम सिंह के बेटे और पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव के हाथ में है। मुलायम सिंह यादव जयंत के दादा चौधरी चरण सिंह को अपना राजनीतिक गुरु मानते हैं। वे चौधरी अजित सिंह को अपना गुरुभाई कहते थे। लेकिन दिलचस्प है कि दिसंबर 1989 में उत्तर प्रदेश की सत्ता मुलायम ने राजनीतिक चुतराई और अपनी सूझबूझ के जरिये चौधरी अजित सिंह  के जबड़े से खींच ली थी।


अजित सिंह का ख्वाब,  जो ख्वाब ही रह गया..
चौधरी अजित सिंह से पिछले 21 की साल की बातचीत में कई बार उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री नहीं बन पाने की टीस उनकी जुबां पर आई। उनसे इस पद और चौधरी चरण सिंह की पूरे उत्तर प्रदेश में राजनीतिक विरासत को 1989 में मुलायम सिंह ने छीन लिया था। इसलिए मुलायम को गुरुभाई कहने पर उन्हें अच्छा नहीं लगता था। इसके बाद अजित सिंह ने कई बार अपना प्रभाव बढ़ाने, राष्ट्रीय लोकदल को मजबूत बनाने की कोशिश की, लेकिन मुलायम की राजनीतिक समझ के आगे सफल नहीं हो पाए। मुलायम ने पश्चिमी यूपी के कुछ जिलों तक उन्हें राजनीतिक रूप से सीमित कर दिया। इतना ही नहीं कई बार अजितत को मुलायम के आगे झुककर, समझौता भी करना पड़ा और फिर अलग भी हुए। टीस इतनी बड़ी रही कि कई बार मुलायम और अजित सिंह के हाथ मिले, पार्टी के बीच में गठबंधन हुआ, लेकिन दिल कभी नहीं मिल सका।
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ऐसे छिन गए अजित सिंह के राजनीतिक उत्तराधिकार

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