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रिसॉर्ट राजनीति : जहां से गिरतीं और बनतीं सरकारें, सियासी संकट से निकलने तक चलता है यहां वोटों का गुणा-भाग

अमर उजाला ब्यूरो, नई दिल्ली। Published by: योगेश साहू Updated Mon, 27 Jun 2022 07:31 AM IST
सार

राजनीतिक टिप्पणीकार रशीद किदवई कहते हैं, जब ‘आया राम-गया राम’ हुआ था, तो इसकी आलोचना की जाती थी, क्योंकि इसे राजनीतिक और सामाजिक स्वीकार्यता नहीं थी, लेकिन अब ऐसा नहीं है। राजनीति की नैतिकता तीन कदम पीछे चली गई है। दलबदलू पुख्ता काम करता है।

अपने विधायकों के साथ एकनाथ शिंदे
अपने विधायकों के साथ एकनाथ शिंदे - फोटो : पीटीआई
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विस्तार

भारत में अस्सी के दशक की आया राम-गया राम की सियासत ने बिल्कुल नया मुकाम हासिल कर लिया है। अबके बागी विधायक और सांसद खुद शानदार रिसॉर्ट्स में ठंडी हवा खा रहे हैं और सियासी गर्मी बाहर उड़ेलकर विरोधी खेमों को झुलसा रहे हैं। महाराष्ट्र में सरकार गिराने का प्रयास हो या हाल के राज्यसभा चुनावों के दौरान विधायकों को एक साथ रखने के लिए लग्जरी होटल या रिसॉर्ट में ले जाना, इस नए चलन में जिस पार्टी के हाथ में इन विधायकों की बागडोर होती है, वह इन होटल या रिसॉर्ट को अभेद्य किले में बदल देती है।



एकनाथ शिंदे के नेतृत्व में शिवसेना विधायकों के एक असंतुष्ट समूह के सूरत के एक होटल से गुवाहाटी के रेडिसन ब्लू होटल में पड़ाव के साथ रिसॉर्ट राजनीति एक बार फिर से हर जुबान पर छायी है। यहां एकजुट होकर बागियों ने महाराष्ट्र में उद्धव ठाकरे के नेतृत्व वाली शिवसेना और एमवीए सरकार को संकट में डाल दिया है। कई मौकों पर रिसॉर्ट राजनीति ने बागियों को फायदा पहुंचाया है, लेकिन कुछ प्रयासों में असफलता भी उनके हाथ लगी है।


लोकतंत्र का ‘बदसूरत’ तमाशा
वर्ष 1982 का देवीलाल-भाजपा गठबंधन विधायकों को उस होटल से भागने से रोकने में विफल रहा, जहां उन्हें रखा गया था। कांग्रेस नेता सचिन पायलट हाल में अशोक गहलोत के नेतृत्व वाली सरकार को गिराने में सफल नहीं हो सके। रिसॉर्ट राजनीति ने नैतिकता पर भी सवाल उठाए हैं। लोकसभा के पूर्व महासचिव पीडीटी आचार्य इसे लोकतंत्र का सबसे ‘बदसूरत’ तमाशा मानते हैं।

वह कहते हैं, यह प्रथा अन्य लोकतंत्रों तक नहीं पहुंचनी चाहिए। उन्होंने मीडिया पर रिसॉर्ट राजनीति की ‘कुरूपता’ को उजागर करने के बजाय सनसनीखेज बनाने का आरोप लगाया। उन्होंने कहा, यह हमारी प्रणाली की कमजोरी को दर्शाता है। हमारे लोकतंत्र के अनैतिक और चरित्रहीन पहलू को सामने लाता है, जो यह पतन का संकेत है।

सियासी नैतिकता तीन कदम पीछे
  • राजनीतिक टिप्पणीकार रशीद किदवई कहते हैं, जब ‘आया राम-गया राम’ हुआ था, तो इसकी आलोचना की जाती थी, क्योंकि इसे राजनीतिक और सामाजिक स्वीकार्यता नहीं थी, लेकिन अब ऐसा नहीं है। राजनीति की नैतिकता तीन कदम पीछे चली गई है। दलबदलू पुख्ता काम करता है। जैसा कि हमने मध्यप्रदेश, कर्नाटक और महाराष्ट्र में देखा। बुद्धिजीवी इसकी आलोचना नहीं करते और मीडिया बड़ी चतुराई का काम मानता है।
  • ‘आया राम-गया राम’ कब आया: ‘आया राम-गया राम’ शब्द 1967 में हरियाणा के नेता गयालाल द्वारा घंटों के भीतर तीन बार दल बदलने के बाद भारतीय राजनीतिक शब्दावली में आया। यह 1985 के दलबदल विरोधी कानून के बावजूद देश में राजनीतिक दलों को परेशान करता रहा। महाराष्ट्र के घटनाक्रम को देखते हुए लगता है कि यह माजरा अभी बना रहेगा।

माननीयों की बाड़बंदी के दो दशक
  • राज्यसभा चुनाव, जून 2022 : कांग्रेस ने राजस्थान के अपने विधायकों को 10 जून को चुनावों से पहले भाजपा द्वारा खरीद-फरोख्त के डर से उदयपुर के आलीशान ताज अरावली रिसॉर्ट और स्पा में स्थानांतरित कर दिया था। भाजपा ने जयपुर के जामडोली में देवी रत्न होटल में अपने विधायकों को बिठाया, लेकिन पार्टी ने इसे प्रशिक्षण शिविर कहा। जैसे ही हरियाणा में उच्च सदन की सीटों की दौड़ तेज हुई, भाजपा ने अपने विधायकों को चंडीगढ़ के एक रिसॉर्ट में स्थानांतरित कर दिया, जबकि कांग्रेस ने खरीद-फरोख्त के डर से अपने विधायकों को रायपुर स्थानांतरित कर दिया।
  • राजस्थान, जुलाई 2020 : सचिन पायलट ने 18 कांग्रेस विधायकों के साथ मुख्यमंत्री अशोक गहलोत के खिलाफ खुलेआम बगावत कर दी थी। तब उन्हें उपमुख्यमंत्री और पार्टी के राजस्थान प्रमुख के पद से बर्खास्त कर दिया गया था। पायलट और उनके विधायकों के हरियाणा और दिल्ली के होटलों में रहने की सूचना मिली थी।

  • मध्यप्रदेश, मार्च 2020 : ज्योतिरादित्य सिंधिया के वफादार कांग्रेस विधायकों ने पार्टी के खिलाफ बगावत कर दी और उन्हें बेंगलुरू के एक होटल में रखा गया। बागियों ने बेंगलुरू से अपना इस्तीफा भेज दिया। कमलनाथ सरकार गिरने के बाद विद्रोह आखिरकार सफल हुआ।
  • कर्नाटक, जुलाई 2019 : कांग्रेस और जद (एस) के बागी विधायकों और भाजपा विधायकों ने रिसॉर्ट राजनीति की, जिसमें बेंगलुरू और मुंबई के बाहरी इलाके में आलीशान होटलों में रहना शामिल था। इसे ऑपरेशन लोटस के नाम से जाना गया।
  • गुजरात राज्यसभा चुनाव 2017 : खरीद-फरोख्त के डर से गुजरात कांग्रेस ने राज्यसभा चुनाव से पहले कर्नाटक के रामनगर जिले के बिड़दी में एक रिसॉर्ट में अपने विधायकों की बाड़ेबंदी कर दी। अहमद पटेल अपनी सीट बरकरार रखने में कामयाब हुए।
  • बिहार, 2000 : जद (यू) के नीतीश कुमार को विश्वास मत का सामना करना पड़ा, तो कांग्रेस और राष्ट्रीय जनता दल ने दलबदल के डर से अपने नेताओं को पटना के एक होटल में भेज दिया। नीतीश कुमार ने विश्वास मत से पहले इस्तीफा दे दिया।
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