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गणतंत्र दिवस 2020: वो सिहरा देने वाली काली रात, उजड़ गया था साढ़े तीन लाख परिवारों का खिलता चमन

अमर उजाला नेटवर्क, नई दिल्ली/जम्मू Updated Sun, 26 Jan 2020 06:05 AM IST
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कश्मीरी पंडित
कश्मीरी पंडित - फोटो : Amar Ujala
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अपने ही गणतंत्र में... तीस साल से विस्थापन का दंश झेल रहे कश्मीरी पंडित उस काली रात को याद कर आज भी सिहर उठते हैं। धरती के स्वर्ग में चमन के उजड़ने की कहानी बयां करते आंखें बरबस ही छलक जाती हैं। सीएए और एनआरसी जैसे मुद्दों पर देश भर में हो रहे प्रदर्शन के बीच वे सवाल करते हैं-1990 को ये सब लोग कहां थे? उनका कुसूर क्या था? उस खौफनाक त्रासदी के दर्द और गुस्से के बीच कश्मीरी पंडितों को आज भी घर लौटने की उम्मीद है। अपने ही देश में शरणार्थी बनकर दर-ब-दर भटक रहे इन लोगों को नए जम्मू-कश्मीर में आशा की किरण दिख रही है।
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जम्मू के नगरोटा की जगती माइग्रेंट कॉलोनी में कश्मीर से विस्थापित हुए करीब पांच हजार परिवार रह रहे हैं। यहीं दो कमरों के ‘फ्लैट’ में 58 साल के शुभन कृष्ण रैना और अशोक धर भी परिवार के साथ रहते हैं। क्या हुआ था उस रात को? ये सुनते ही बेचैन हो उठते हैं। आंखें भर आती हैं। बताते हैं- साजिश के तहत उन्हें निकाला गया। धर्मांध जिहादियों ने पहले ही कश्मीरी पंडितों को भगाने के लिए माहौल बना दिया था। पहले एक-एक कर समाज के प्रभावशाली लोगों को मारना शुरू किया। 

आंखों के सामने भाई की हत्या...तो बहू-बेटियों से दुष्कर्म
आतंकियों का डेथ वारंट इश्यू करने वाले एक जज, एडवोकेट टीका राम टपलू, कारोबारी सतीश भट्ट समेत कई पंडितों को घर से निकालकर सरेआम गोली मार दी गई। किसी की आंखों के सामने भाई को मार दिया, तो किसी की बहू-बेटी की आबरू लूट ली गई। जुल्म के खिलाफ आवाज उठाने पर एक नर्स को आरे से जिंदा चीर दिया। जान से मारने की धमकी के बाद घर में चावल के ड्रम में छिपे एक पंडित को गोलियों से भून दिया।

इसके बाद उसकी पत्नी को खून से सने चावल पकाकर खिलाया। कश्मीर छोड़कर भाग जाने के लिए पंडितों के घरों के बाहर और सड़कों पर पोस्टर चस्पा कर दिए गए। अखबारों में इश्तिहार दिया गया-धर्म बदलो या कश्मीर छोड़ दो। 19 जनवरी, 1990 के दिन श्रीनगर में लाखों लोगों का जुलूस निकाला गया। नारे लगे- हम क्या चाहते आजादी, कश्मीरी पंडितों भाग जाओ, औरतों को छोड़ जाओ।

दहशत भरे ऐसे माहौल में डरे सहमे पंडित घरों में दुबक गए थे। इसी रात करीब नौ बजे पूरे कश्मीर में धार्मिक स्थलों से एक साथ अनाउंसमेंट होते हैं-पंडितों 24 घंटे में कश्मीर छोड़ दो वरना अंजाम भुगतने को तैयार रहो। पंडितों को लगा कि यहां अब मदद करने वाला कोई नहीं है। जान और आबरू बचाने के लिए रातों-रात पुरखों के घर-बार छोड़कर साढ़े तीन लाख लोग रोते-बिलखते घाटी से निकल आए। जिसने जो पहना था, उसी में बहू-बेटियों और बच्चों को लेकर भागा।

राजकुमार टिक्कू कहते हैं-आतंक के इस नंगे नाच के बीच पंडितों की मदद को प्रशासन-सरकार का कोई नुमाइंदा आगे नहीं आया। मानों उन्हीं की शह से सब हो रहा हो। बचपन में जिनके साथ खेले थे, वो ही जान लेने को उतारू थे। पंडितों के घाटी से निकलते ही उनके घरों को आग लगा दी गई। लूटपाट के बाद मंदिर जला दिए गए। जमीन कब्जा ली गई। जिनकी संपत्ति बची थी, उन्हें भी बेचने पर मजबूर कर दिया गया। आज उनके पुरखों के घर खंडहर में तब्दील हो चुके हैं।
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