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महिलाएं खुद को आत्महत्या जैसी बुराई से बाहर निकाल रही हैं, पुरुष अभी तक फंसे हैं...

जितेंद्र भारद्वाज, अमर उजाला, नई दिल्ली Updated Wed, 12 Sep 2018 10:04 PM IST
Report: Women are out of suicide, men are still trapped
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बदलते जमाने के साथ अपने देश की महिलाएं भी खुद को बदल रही हैं। बात तरक्की की हो या किसी सामाजिक बुराई से पीछा छुड़ाने की, दोनों ही मामलों में महिलाओं ने साबित कर दिया है कि अब वे डर कर नहीं, बल्कि जी कर आगे बढ़ेंगी। इंडियन काउंसिल ऑफ मेडिकल रिसर्च (आईसीएमआर) की रिपोर्ट बताती है कि महिलाओं द्वारा आत्महत्या करने के मामले घट रहे हैं, जबकि पुरुषों का आंकड़ा कम नहीं हो पा रहा है। 1990 में एक लाख महिलाओं पर करीब 20 महिलाएं किसी वजह से आत्महत्या कर लेती थी, लेकिन आज वह आंकडा 14.7 पर आ गया है।
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दूसरी तरफ पुरुषों की बात करें तो 1990 में एक लाख पुरुषों के पीछे 22 पुरुष आत्महत्या जैसी सामाजिक बुराई का शिकार थे। आज भी हालत में कोई ज्यादा सुधार नहीं आया है। 2016 में पुरुषों की वह संख्या 21 पर अटकी है। आईसीएमआर में पेश की गई अपनी रिपोर्ट में पब्लिक हेल्थ फाउंडेशन ऑफ इंडिया की पदाधिकारी प्रो. राखी दनदोना का कहना है कि लंबे समय तक चार दीवारी के भीतर रहने वाली महिलाओं ने अब जीना सीख लिया है। वे खुद के अधिकारों के लिए लड़ने लगी हैं।

अच्छी बात यह है कि वे अब आत्महत्या जैसी सामाजिक बुराई से दूर हो रही हैं। बता दें कि हमारे देश में 1990 के दौरान आत्महत्या के 164400 केस सामने आए थे, आज वह संख्या 230300 पर पहुंच गई है। हालांकि अभी भी भारत में दुनिया के मुकाबले आत्महत्या के ज्यादा केस देखने को मिल रहे हैं। दुनिया में महिलाओं द्वारा आत्महत्या करने के कुल मामले देखें तो उसका 37 प्रतिशत हिस्सा भारत में है। प्रो. दनदोना के अनुसार, यह ठीक है कि महिलाओं के आत्महत्या के मामले कम हो रहे हैं, लेकिन इसे वैश्विक स्तर पर देखा जाए तो यह मौजूदा संख्या अभी भी ज्यादा है। दुनिया में महिलाओं की आत्महत्या का प्रतिशत सात है, लेकिन भारत में वह 14.7 है।

पुरुषों के मामले कम क्यों नहीं हो पा रहे हैं, यह एक वृहद रिसर्च का विषय है, दनदोना ने इस बाबत कहा है, हम अभी इस पर रिसर्च कर रहे हैं। इसके कई कारण हो सकते हैं, जैसे नौकरी, परिवारिक कलह, बैंक का लोन व अन्य सामाजिक परिस्थितियां आदि। इसमें सबसे सबसे बड़ी बात यह है कि पुरुषों द्वारा आत्महत्या के मामले की जांच पड़ताल सही से नहीं होती।अधिकांश मामलों में देखा गया है कि वे अपनी बात किसी के सामने सांझा नहीं कर पाते हैं। इसके लिए सरकार, स्वास्थ्य विभाग, शिक्षण संस्थान और समाज, सभी को हर स्तर पर प्रयास करना होगा। विशेषज्ञों को पुरुषों की समस्याओं का गहराई से जानकर उनका निदान करने के लिए आगे आना चाहिए।

अगर आत्महत्या के मामलों की यह संख्या तेजी से नहीं गिरती है तो 2030 में इसकी दर कम करने का लक्ष्य भी पूरा नहीं होगा। सरकार ने अपने लक्ष्य में 2030 तक आत्महत्या के केसों में तीस से चालीस फीसदी की कमी लाने का टारगेट रखा है।
 
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