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Rajasthan Congress Crisis: कांग्रेस हाईकमान को डर, कहीं राजस्थान कांग्रेस में भी कोई ‘कैप्टन’ न बन जाए

Jitendra Bhardwaj जितेंद्र भारद्वाज
Updated Mon, 26 Sep 2022 12:34 PM IST
सार

Rajasthan Congress Crisis: राजस्थान की 200 सदस्यीय विधानसभा में कांग्रेस पार्टी के 108 विधायक हैं। 13 निर्दलीय विधायकों में से ज्यादातर, गहलोत सरकार के पक्ष में बताए जा रहे हैं। भाजपा के पास 71 विधायक हैं। अगर स्पीकर द्वारा गहलोत समर्थक विधायकों का इस्तीफा स्वीकार हो जाता है, तो भाजपा के लिए सरकार बनाना आसान हो जाएगा...

Rajasthan Congress Crisis: बस से गहलोत गुट के विधायक रवाना।
Rajasthan Congress Crisis: बस से गहलोत गुट के विधायक रवाना। - फोटो : ANI
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विस्तार

कांग्रेस पार्टी अपने कार्यकर्ताओं में जान फूंकने और विपक्षी मोर्चे पर खुद को मजबूत साबित करने के लिए ‘भारत जोड़ो यात्रा’ निकाल रही है। अभी यात्रा चल ही रही है कि बीच में पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष का चुनाव आ गया। इस चुनाव के मद्देनजर राजस्थान का सियासी संकट भी गहरा गया। वजह, मुख्यमंत्री अशोक गहलोत के राष्ट्रीय अध्यक्ष बनने की संभावनाएं प्रबल बनती जा रही हैं। इसके लिए वे सीएम का पद छोड़ने को तैयार हैं, लेकिन मुख्यमंत्री की कुर्सी पर सचिन पायलट को नहीं देखना चाहते। पार्टी के कई वरिष्ठ नेता, राजस्थान के सियासी घटनाक्रम से चिंतित हैं। उनका मानना है कि भारत जोड़ो यात्रा के मकसद को इस घमासान ने बड़ा नुकसान पहुंचा दिया है। वहीं कांग्रेस नेताओं को यह डर भी सता रहा है कि क्या राजस्थान कांग्रेस में भी कोई नेता कैप्टन अमरिंदर  सिंह बनने की राह पर आगे बढ़ रहा है। अगर ऐसा होता है कि कांग्रेस पार्टी के लिए उस नुकसान की भरपाई करना बहुत मुश्किल हो जाएगा।

पंजाब का हाल कांग्रेस पार्टी देख चुकी है

पंजाब विधानसभा चुनाव से पहले, प्रदेश कांग्रेस कमेटी में तगड़ा घमासान मचा था। नतीजा, पार्टी को कैप्टन अमरिंदर सिंह को मुख्यमंत्री पद से हटाना पड़ा। उसके बाद चरणजीत सिंह चन्नी को मुख्यमंत्री बनाया गया। कैप्टन अमरिंदर सिंह ने कांग्रेस को अलविदा बोलकर अलग पार्टी बना ली। नवजोत सिंह सिद्धू खेमा भी नाराज हो गया। वरिष्ठ नेता सुनील जाखड़ ने भी पार्टी से किनारा कर लिया। विधानसभा चुनाव में कांग्रेस पार्टी का सूपड़ा हो गया। पिछले दिनों कैप्टन अमरिंदर सिंह ने अपनी पार्टी का भाजपा में विलय करा दिया। सुनील जाखड़, पहले ही भाजपाई हो चुके हैं। राजस्थान कांग्रेस में जो घमासान मचा है, उसमें भी कुछ ऐसे ही आसार दिख रहे हैं। रविवार को जो घटना क्रम हुआ, वह पार्टी के लिए शुभ नहीं माना जा रहा।

गुटबाजी के चलते खाली हाथ दिल्ली लौटे पर्यवेक्षक

कांग्रेस पार्टी के दो पर्यवेक्षक, जिनमें से एक राजस्थान कांग्रेस के प्रभारी अजय माकन थे और दूसरा नाम बतौर पर्यवेक्षक मल्लिकार्जुन खड़गे का है। इन दोनों नेताओं को राजस्थान में कांग्रेस पार्टी को सियासी संकट से उभारने के लिए जयपुर भेजा गया था। राजस्थान कांग्रेस में मुख्यमंत्री अशोक गहलोत और सचिन पायलट के बीच गतिरोध इतना ज्यादा रहा कि दोनों पर्यवेक्षकों ने वापस दिल्ली लौटना ही बेहतर समझा। ये पर्यवेक्षक अब पार्टी अध्यक्ष सोनिया गांधी को अपनी रिपोर्ट सौंप रहे हैं। पार्टी से जुड़े एक वरिष्ठ नेता का कहना है कि भारत जोड़ो यात्रा से कांग्रेस पार्टी मजबूत हो रही थी। भाजपा में बौखलाहट देखी गई। यात्रा के बारे में कई तरह का झूठ फैलाकर पार्टी और राहुल गांधी की छवि को नुकसान पहुंचाने का प्रयास किया गया। इसके बावजूद जैसे-जैसे यात्रा आगे बढ़ती गई, वैसे ही कांग्रेस पार्टी को फायदा होता चला गया। विभिन्न राज्यों में भी अलग से यात्रा निकालने की रणनीति बनने लगी, लेकिन कांग्रेस अध्यक्ष के चुनाव ने भारत जोड़ो यात्रा से मिले उत्साह को तोड़ कर रख दिया है।

पार्टी में एक व्यक्ति, एक पद का फॉर्मूला

मुख्यमंत्री अशोक गहलोत का नाम कांग्रेस अध्यक्ष के लिए आगे बढ़ चुका था। अगर उनके सामने कोई दूसरा उम्मीदवार होता, तब भी गहलोत का पलड़ा भारी होने की उम्मीद की जा रही थी। वजह, अशोक गहलोत को कांग्रेस हाईकमान का समर्थन हासिल है। राहुल गांधी ने अपनी यात्रा में जब यह बात कही कि पार्टी में एक व्यक्ति एक पद का फार्मूला ही रहेगा, तो गहलोत के लिए संकट खड़ा हो गया। पार्टी का सीधा संकेत था कि गहलोत, कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष बनते हैं तो उन्हें मुख्यमंत्री की कुर्सी छोड़नी होगी। रविवार को इसी मुद्दे पर सियासी घमासान मच गया। सीएम पद के लिए सचिन पायलट खेमे की दावेदारी देखकर अशोक गहलोत खेमे के विधायक भी आवेश में आ गए। वे कांग्रेस पार्टी के पर्यवेक्षकों की बैठक में भाग लेने के लिए सीएम आवास नहीं पहुंचे। उनका कहना था कि गहलोत के कांग्रेस अध्यक्ष बनने पर प्रदेश में जो भी नेता मुख्यमंत्री बनेगा, वह उन्हीं की पसंद का होगा। गहलोत खेमे ने विधानसभा अध्यक्ष सीपी जोशी का नाम आगे बढ़ा रखा है। मतलब साफ है कि राजस्थान का मुख्यमंत्री अब दिल्ली से ही तय होगा। पर्यवेक्षकों की रिपोर्ट पर गौर करने के बाद कांग्रेस हाईकमान, मुख्यमंत्री के नाम का ऐलान करेगा।

इस वजह से विधायकों की बैठक रद्द कर दी गई

रविवार रात आठ बजे सचिन पायलट गुट के दो दर्जन विधायक बैठक के लिए सीएम आवास पहुंचे थे। वहां गहलोत गुट के विधायक नहीं पहुंचे। पौने नौ बजे खबर आई कि गहलोत समर्थक विधायक सामूहिक तौर पर इस्तीफा देंगे। नाराज विधायक, विधानसभा अध्यक्ष सीपी जोशी के आवास की ओर जाने लगे। नतीजा, विधायकों की बैठक रद्द कर दी गई। अब इस प्रकरण के बाद कहा जा रहा है कि कांग्रेस पार्टी, गहलोत को राष्ट्रीय अध्यक्ष की जिम्मेदारी के बारे में भी सोचेगी। दूसरी ओर गहलोत ने इशारों में कह दिया है कि कांग्रेस हाईकमान की पहली प्राथमिकता 2023 का विधानसभा चुनाव होना चाहिए। भारत जोड़ो यात्रा के दौरान अशोक गहलोत और सचिन पायलट गुट में चल रही जबरदस्त खींचतान पार्टी के लिए नुकसानदायक साबित हो सकती है। कांग्रेस पार्टी का एक धड़ा यह भी मानकर चल रहा है कि मुख्यमंत्री पद के लिए सभी विधायक एकमत नहीं होते तो दोनों में से कोई एक नेता पार्टी छोड़ने जैसा कदम उठा सकता है। गहलोत के पक्ष में करीब सौ विधायकों का इस्तीफा, ऐसी स्थिति में कांग्रेस हाईकमान को बहुत संभलकर कदम रखना होगा।   

घटनाक्रम से नाराज है कांग्रेस हाईकमान

राजस्थान की 200 सदस्यीय विधानसभा में कांग्रेस पार्टी के 108 विधायक हैं। 13 निर्दलीय विधायकों में से ज्यादातर, गहलोत सरकार के पक्ष में बताए जा रहे हैं। भाजपा के पास 71 विधायक हैं। अगर स्पीकर द्वारा गहलोत समर्थक विधायकों का इस्तीफा स्वीकार हो जाता है, तो भाजपा के लिए सरकार बनाना आसान हो जाएगा। हालांकि ऐसी संभावनाएं कम ही हैं। दूसरा, सचिन पायलट यदि गहलोत खेमे के तीन दर्जन विधायकों को अपने साथ लाने में कामयाब होते हैं, तो हाईकमान को उनके बारे में भी सोचने के लिए मजबूर होना पड़ेगा। गहलोत खेमे का कहना है कि दो साल पहले बगावत करने वाले 18 विधायकों में से किसी को भी मुख्यमंत्री न बनाया जाए। इन विधायकों में सचिन पायलट और उनके समर्थक विधायक ही शामिल रहे हैं। उधर सोमवार को राजस्थान कांग्रेस प्रभारी अजय माकन ने कहा, कांग्रेस विधायकों द्वारा अलग से बैठक करना, अनुशासनहीनता के दायरे में आता है।

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