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व्हाट्सएप की अफवाहों ने ली 27 की जान, जानें कब और कहां भीड़ ने निर्दोंषों को बनाया शिकार

स्नेहा बलूनी, अमर उजाला, नई दिल्ली Updated Fri, 06 Jul 2018 11:40 AM IST
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हम लोग 21वीं सदी में जी रहे हैं। जहां सूचनाएं बड़ी तेजी से सोशल मीडिया, व्हाट्सएप, टेक्स्ट संदेशों के जरिए एक-दूसरे के पास भेजी जाती हैं। कई बार यह सूचनाएं आपके लिए फायदेमंद होती हैं तो कई बार इसकी वजह से किसी बेकसूर को अपनी जिंदगी गंवानी पड़ती है। आम तौर पर देखा जाता है कि लोग सोशल मीडिया पर आए मैसेज को बिना सोचे-समझे आगे आगे भेज देते हैं। कई बार सालों पुराने वीडियो को वायरल करके उसका फायदा उठाने की कोशिश की जाती है। आज की इस भागदौड़ भरी जिंदगी में जहां इंसान के पास किसी घटना की पुष्टि करने का समय नहीं है वहां पर व्हाट्सएप पर आया एक मैसेज एक गलत मानसिकता और उग्र भीड़ को जन्म देता है जिसके कारण अब तक 27 लोगों की जान चली गई है। इन घटनाओं में पीड़ित को अपना पक्ष रखने का मौका तक नहीं दिया जाता और भीड़ खुद फैसला करने पर उतर आती है।

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अफवाहें फैलाने का माध्यम बनता व्हाट्सएप

व्हाट्सएप सभी की जिंदगी का अहम हिस्सा बन चुका है। सभी अपने दोस्तों, रिश्तेदारों और परिवार के सदस्यों से संपर्क में रहने के लिए इसका इस्तेमाल करते हैं। लेकिन यही व्हाट्सएप इन दिनों फर्जी खबरें, वीडियो फैलाने का जरिया बन गया है। वर्तमान में 200 मिलियन यूजर्स व्हाट्सएप पर सक्रिय हैं। यही यूजर व्हाट्सएप की गुमनाम दुनिया में अफवाहों का शिकार बन जाते हैं। यह अफवाह कहां से आई, किसने भेजी यह किसी को नहीं पता लेकिन भेड़चाल में हम इसे आगे फॉरवर्ड कर देते हैं। बेशक हमारा मकसद अपने जानने वालों को किसी अमुक घटना के प्रति सावधान करना होता है लेकिन अनजाने में हम किसी निर्दोष की हत्या के जिम्मेदार बन जाते हैं। इन अफवाहों को फैलाने वाले बच जाते हैं और उनका भांडा फोड़ना मुश्किल हो जाता है। 


व्हाट्सएप और फेसबुक पर बिना किसी खबर की पुष्टि किए लोगों ने मैसेज फॉर्वर्ड किए जिसके कारण पिछले साल मई से लेकर जुलाई तक 27 लोग मारे गए। किसी को बच्चा चोरी के शक में तो किसी को बच्चों के अंगों की तस्करी के शक में भीड़ ने मार दिया। कई बार मजाक में तो कई बार सोची-समझी साजिश के तहत अफवाहों को जन्म दिया जाता है। जिसके बाद भीड़ उसपर टूट पड़ती है और उसे बड़ी ही निर्दयता से मार देती है। 27 लोगों की मौत के बाद जागी सरकार ने व्हाट्सएप को नोटिस भेजा है और अफवाहों को रोकने के लिए कड़े कदम उठाने के निर्देश दिए हैं। आज हम आपको बताते हैं अफवाह के चलते भीड़ ने किसको और कहां अपना शिकार बनाया है।

झारखंड- 7 मौतें

18 मई, 2017, स्थान- नगाडीह गांव, पूर्वी सिंहभूम
पीड़ित- 25 साल के विकास वर्मा और 27 साल के गौतम वर्मा, उनके साथ 26 साल के दोस्त गंगेश गुप्ता भी थे। वर्मा भाईयों ने ग्रामीण क्षेत्रों में शौचालय बनाने का काम शुरू किया था। इसके लिए उन्होंने गड्ढे खोदने शुरू किए। 18 मई को रात के 8.30 बजे जब वह जमशेदपुर के जुगसलाई में थे उनपर 1000 लोगों की भीड़ ने हमला कर दिया। नजदीकी पुलिस स्टेशन घटनास्थल से केवल 4 किलोमीटर दूर था। अफवाह के कारण जब उनपर हमला हुआ तो पुलिस मौके पर पहुंच गई।

19 मई, 2017 स्थान- शोभापुर गांव, सरायकेला-खारसवान
पीड़ित- 25 साल के नैम, 26 साल के शेख सज्जू, 26 साल के शेख सिराज औप 28 साल के शेख हलीम। सभी पीड़ित हल्दीपोखर गांव के रहवे वाले थे। उनपर कथित गोकशी में शामिल होने का आरोप लगाया गया। जिसके बाद 600-700 लोगों की भीड़ ने 19 मई की सुबह उन्हें मार दिया। घटनास्थल से 20 किलोमीटर दूरी पर पुलिस स्टेशन था। पुलिस एक घंटे बाद मौके पर पहुंची।

अफवाह- दोनों ही घटनाओं में एक हिंदी अखबार में एक खबर छपी थी कि बच्चों को चुराने वाले गैंग शिकार की खोज में जमशेदपुर के पोटका, असनबोनी औप मुसाबोनी क्षेत्र में घूम रहे हैं। यह रिपोर्ट जल्द ही फेसबुक पोस्ट में और फिर व्हाट्सएप मैसेज में बदल गई।

तमिलनाडु- 1 मौत

9 मई 2018 स्थान- अथीमूर गांव, तिरुवन्नामलाई
पीड़ित- 65 साल की रुकमणी अपने रिश्तेदार के साथ मंदिर जा रही थीं। अपनी यात्रा के दौरान वे रुके और गांववालों से रास्ता पूछा। रुकमणी ने पास में खेल रहे बच्चों को चॉकलेट दीं। जैसे ही वह निकलीं अफवाह फैल गई कि उन्होंने बच्चों को लालच देने के लिए चॉकलेट दी हैं। जिसके बाद 200 लोगों की भीड़ ने अथीमूर में उनपर हमला कर दिया। घटनास्थल से 3 किलोमीटर की दूरी पर पुलिस स्टेशन था। पुलिस 30 मिनट बाद घटनास्थल पर पहुंची। 

अफवाह- तमिल भाषा में एक वीडियो वहाट्सऐप पर सर्कुलेट किया जा रहा था जिसमें कहा गया था कि गांव से कई बच्चों का अपहरण किया जा रहा है। 

कर्नाटक- 1 मौत

23 मई, 2018 कोट्टनपेट, बंगलूरू
पीड़ित- 26 साल के कालू राम जोकि राजस्थान के एक मजदूर थे। उन्हें दिन के 1.30 बजे 50 लोगों ने घेरकर मार दिया। काम की तलाश में कालू बंगलूरू आए थे। वह अकेले जा रहे थे कि तभी वहां मौजूद दो लोगों ने उसे देखा और पीछा किया। अचानक भीड़ इकट्ठा हुई जिसने बिना सोचे-समझे जिसके हाथ जो लगा उसी से पीड़ित को पीटना शुरू कर दिया। घटनास्थल से 2 किलोमीटर की दूरी पर पुलिस स्टेशन था जो जानकारी मिलने के 10 मिनट बाद वहां पहुंची।

अफवाह- क्षेत्र में काफी लंबे समय से बच्चों को चुराने की फर्जी विडियो सर्कुलेट की जा रही थीं। जिसमें कहा जा रहा था कि अपने बच्चों को अकेला मत छोड़िए। अगर आपको ऐसे किडनैपर्स मिलते हैं तो उन्हें बांध लीजिए और पुलिस को बुलाइए।

तेलंगाना- 1 मौत

23 मई 2018 स्थान- जियापल्ली गांव, नालगोंडा
पीड़ित- 33 साल के ऑटोरिक्शा ड्राइवर एन बालाकृष्णा कोरेमुल्ला गांव के रहने वाले थे। वह 18 किलोमीटर दूर जियापल्ली अपने रिश्तेदार से मिलने के लिए पहुंचे थे। उन्हें ताड़ी की दुकान के बाहर 50 लोगों की भीड़ ने केवल इसलिए मार दिया क्योंकि वह उन्हें यह विश्वास दिलाने में नाकाम रहे कि वह बच्चा चोर करने वाले गैंग से नहीं हैं। घटनास्थल से 15 किलोमीटर की दूरी पर पुलिस स्टेशन था। पुलिस घटनास्थल पर आधे घंटे बाद पहुंची। 

अफवाह- दो हफ्ते पहले से चोर और अपहरणकर्ताओं की अफवाहें फैली हुई थीं।

आसाम- 2 की मौत

8 जून 2018 स्थान- पंजुरी कचारी गांव, कार्बी अंगलोंग
पीड़ित- 30 साल के अभीजित नाथ और 29 साल के निलोत्पल दास। दोनों ही गुवाहाटी के रहने वाले थे उन्हें शाम के 7.30 बजे 500 लोगों की भीड़ ने बच्चा चोर होने के शक में पीट-पीटकर मार दिया। नाथ जहां गुवाहाटी के ठेकेदार तो वहीं दास गोवा में साउंड इंजीनियर थे। नाथ अपने काम से बाहर गए थे और उन्होंने दोस्त को साथ चलने के लिए कहा। घटनास्थल से 18 किलोमीटर की दूरी पर पुलिस स्टेशन था। पुलिस रात के 9.10 बजे मौके पर पहुंची।

अफवाह- एक हफ्ते पहले से ही फेसबुक पोस्ट और एक-दूसरे के जरिए यह अफवाह फैलाई गई कि क्षेत्र में बच्चा चोर घूम रहे हैं। 

पश्चिम बंगाल- 2 मौत
13 जून 2018 स्थान- बुलबुलचंडी-दुबापारा गांव, माल्दा
पीड़ित- 30 साल के मानसिक बीमार शख्स को 60 लोगों की भीड़ ने हत्या कर दी। घटनास्थल से 8 किलोमीटर की दूरी पर पुलिस स्टेशन था जो 30 मिनट बाद मौके पर पहुंची। 

23 जून, स्थान- माथुरी, पूर्वी मिदनापुर
पीड़ित- 36 साल के बीकॉम ग्रैजुएट संजय चंद्रा काम देने वाले एक शख्स से मिलने के लिए आए थे। गर्मी की वजह से उन्होंने अपना चेहरा ढंका हुआ था। स्थानीय लोगों ने उन्हें एक नाबालिग लड़की के साथ बात करते हुए देखा और उन्हें शक हुआ। जल्द ही 1000 लोगों की भीड़ ने उनपर हमला कर दिया। घटनास्थल से 8 किलोमीटर की दूरी पर पुलिस स्टेशन था और 2-3 पुलिसवाले चेकपोस्ट पर कुछ ही मिनटों में पहुंच गए। 

अफवाह- दोनों ही क्षेत्रों में बच्चा चोरी की अफवाहें फैली थीं। खासतौर से जुबानी तौर पर। 

छत्तीसगढ़- 1 मौत
 
22 जून स्थान- मंद्रकला गांव, सरगुजा
पीड़ित- एक अज्ञात शख्स, पुलिस के अनुसार वह मानसिक विकलांग था। उसे 15 लोगों ने इसलिए मार दिया क्योंकि वह अपनी निर्दोषता को साबित नहीं कर पाया था। घटनास्थल से 12 किलोमीटर की दूरी पर पुलिस स्टेशन था। पुलिस को हमले की सूचना दी गई लेकिन कोई भी समय पर नहीं पहुंचा।  

अफवाह- बच्चा चोरी करने वाले गैंग की खबरें फैलाई जा रही थीं। दो महीने पहले पड़ोस के अंबिकापुक जिले से कुछ बच्चों को चुराया गया था। जिसके बाद इन अफवाहों को बल मिला। बहुत से वायरल मैसेज में कहा जा रहा था कि 500 लोगों की एक टीम छत्तीसगढ़ और मध्य प्रदेश में बच्चों को अगवा करके उनकी किडनी निकाल रही है। 

त्रिपुरा- 3 मौत

28 जून स्थान- सिधाई मोहनपुर, पश्चिमी त्रिपुरा
पीड़ित- 30 साल के जहीर खान जोकि एक रेहड़ीवाले थे उन्हें 1000 लोगों की भीड़ ने मार दिया। वह अपने तीन साथियों के साथ माल बेचने के लिए वैन से यात्रा कर रहे थे तभी भीड़ ने हमला कर दिया। घटनास्थल से 8-10 किलोमीटर की दूरी पर पुलिस स्टेशन था। चारों ने त्रिपुरा स्टेट राइफल्स के स्थानीय कैंप में शरण ली। जिसके बाद पुलिस ने हवा में फायरिंग की लेकिन लोगों की संख्या ज्यादा थी। 

स्थान- कलाच्चारा, दक्षिण त्रिपुरा
पीड़ित- 33 साल की सुकंता चक्रवर्ती एक एनाउंसर थी जिन्हें कि जागरुकता फैलाने के लिए अधिकारियों ने नौकरी पर रखा था। उन्हें दोपहर के तीन बजे 2000 लोगों की भीड़ ने बाजार में मार दिया। घटनास्थल से 8-10 किलोमीटर की दूरी पर पुलिस स्टेशन था। कुछ पुलिसवाले घटनास्थल पर मौजूद थे लेकिन लोगों की संख्या ज्यादा थी।

स्थान- लक्ष्मीबिल गांव, सिपाहिजाला
पीड़ित- एक अज्ञात महिला थी उन्हें और एक महिला पर भीड़ ने हमला कर दिया। घटनास्थल से 5-6 किलोमीटर की दूरी पर पुलिस स्टेशन था।

अफवाह- इस घटना के पीछे एक अफवाह था जिसे कि सोशल मीडिया और जुबान के जरिए फैलाया जा रहा था। इसकी शुरुआत 11 साल के एक बच्चे का शव मोहनपुरा क्षेत्र में मिलने के बाद हुई थी जिसपर कटे हुए के निशान थे। इन निशानों की वजह से खबर फैल गई कि बच्चे की किडनी निकाली गई है जोकि पोस्टमार्टम रिपोर्ट में आधारहीन साबित हुईं। 

महाराष्ट्र- 9 मौत
1 जुलाई 2018, स्थान- राईनपाडा, धुले
पीड़ित- 36 साल के दादाराव भोसले और उनके 45 साल के भाई भरत, 45 साल के भरत माल्वे, 20 साल की आगनू श्रीमत इंगोले और 47 साल के राजू भोसले। पांचों एक ही परिवार के और खानाबदोश गोसावी समुदाय से ताल्लुक रखते थे। उन्हें 3,500 लोगों की भीड़ ने मार दिया। घटनास्थल से 20 किलोमीटर की दूरी पर आउटपोस्ट था जबकि 40 किलोमीटर की दूरी पर पिमपल्नेर स्टेशन था। पिमपल्नेर थाने में सुबह 11.10 बजे फोन किया गया और 12.15 पर पुलिस मौके पर पहुंची।

अफवाह- सोशल मीडिया के जरिए कई तरह की अफवाहें फैलाई जा रही थी। जिसमें दो 40 सेकेंड का वीडिया भी था जिसमें लाइन से बच्चों के क्षत-विक्षत शव दिखाए जा रहे थे। वीडियो के वॉयस ओवर में कहा जा रहा था कि इनका अपहरण किया गया है। दूसरे वीडियो में हिजाब पहनी महिला दिखाई गई थी जिसमें कहा गया था कि इस तरह की महिलाएं बच्चों का अपहरण कर रही हैं। इसी तरह की अफवाह में चार और लोगों को महाराष्ट्र में भीड़ ने पिछले महीने मार दिया। अफवाह की वजह से औरंगाबाद में 3 और गोंदिया में एक की मौत हो गई। इस घटना के बाद महाराष्ट्र सरकार ने फैसला लिया है कि वह व्हाट्सएप ग्रुप की निगरानी करेगी। ग्रुप में पुलिसकर्मियों को भी शामिल किया जाएगा।

व्हाट्सएप मैसेज का प्रभाव
व्हाट्सएप पर भेजे जा रहे संदेश कौन भेजता है, कहां से आते हैं इसका पता किसी को नहीं होता है। मगर जब बात बच्चों की सुरक्षा की आती है तो कोई भी इस बात की पुष्टि नहीं करता कि यह सच है या झूठ। व्हाट्सएप पर जंगल की आग की तरह अफवाहें फैलाई जाती हैं। इसके कारण एक राज्य के लोगों को दूसरे राज्य के नागरिकों के खिलाफ भड़काने का काम भी हो रहा है। 

पढ़े-लिखे 40 प्रतिशत युवा भी नहीं परखते सच्चाई
यूनिवर्सिटी ऑफ वारविक के एक शोध के अनुसार 40 प्रतिशत पढ़-लिखे युवा किसी खबर की सच्चाई की जांच नहीं करते हैं। यदि उन्हें कोई खबर या वीडियो गलत लगती है तो भी केवल 45 प्रतिशत युवा ही सच्चाई की जांच करने की जहमत उठाते हैं।

इन बातों का रखें ख्याल
1. यदि आपके पास बच्चा चोरी, अंग निकालने वाले किसी गिरोह आदि का कोई संदेश या वीडियो आते है तो बिना सोचे-समझे उसे आगे फॉरवर्ड ना करें।
2. व्हाट्सएप को नफरत फैलाने का जरिया ना बनाएं।
3. भड़काऊ या उकसाने वाले संदेशों की सत्यता की जांच किए बगैर उन्हें प्रसारित करने से बचें।
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