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महाराष्ट्र: सोनिया, पवार और गठबंधन की पहेली

बीबीसी Updated Tue, 19 Nov 2019 08:26 PM IST
महाराष्ट्र में राजनीतिक हलचल
महाराष्ट्र में राजनीतिक हलचल - फोटो : PTI
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सुनने में ये बात भले ही विरोधाभासी लगे, लेकिन मौजूदा कांग्रेस नेतृत्व महाराष्ट्र में सरकार बनाने को लेकर ऐसे ही चिंतित नहीं है। ऊपर से तो ऐसा लग रहा है कि कांग्रेस की अध्यक्ष सोनिया गांधी चाहती हैं कि महाराष्ट्र में कांग्रेस-एनसीपी-शिवसेना गठबंधन की सरकार बने लेकिन अगर इस तरह की गठबंधन सरकार नहीं भी बन पाती है तो वो ज्यादा परेशान नहीं होंगी।
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महाराष्ट्र में सरकार गठन को लेकर सोनिया गांधी के इस समय तीन अहम सलाहकार हैं, अहमद पटेल, एके एंटनी और सुशील कुमार शिंदे। लेकिन इन तीनों के अलावा राहुल और प्रियंका गांधी भी सबसे खास सलाहकार बने हुए हैं। राहुल और प्रियंका की किसी भी राय को बहुत महत्वपूर्ण माना जा रहा है। इन सारे सलाहकारों में एक बात जो कॉमन है वो ये कि वो कांग्रेस पार्टी के कोई बहुत ज्यादा साहसिक कदम उठाने के पक्ष में नहीं हैं।

सोनिया की कश्मकश

सोनिया गांधी कांग्रेस पार्टी में वरिष्ठता को बहुत अहमियत देती हैं और अपनी राजनीतिक विरासत को देखते हुए वो कांग्रेस पार्टी की कोर विचारधारा धर्मनिरपेक्षता से किसी तरह की छेड़छाड़ नहीं चाहती हैं। वो नहीं चाहती हैं कि इतिहास में कोई उन्हें कांग्रेस के एक ऐसे नेता की तरह याद करे जिसने धर्मनिरपेक्षता के साथ समझौता किया।

लेकिन साथ ही साथ सोनिया गांधी के अंदर का राजनेता ये भी नहीं चाहता कि कांग्रेस के प्रमुख प्रतिद्वंद्वी बीजेपी को महाराष्ट्र में सरकार बनाने से रोकने का मौका हाथ से जाने दिया जाए। कांग्रेस की मुखिया होने के नाते वो जानती हैं कि महाराष्ट्र का करीब-करीब हर एक कांग्रेसी एमएलए चाहता है कि प्रदेश में शिवसेना-एनसीपी-कांग्रेस गठबंधन सरकार बने।

अगर शिवसेना के प्रस्ताव को कांग्रेस ने एक सिरे से खारिज कर दिया होता तो इस बात की पूरी आशंका है कि पार्टी के महाराष्ट्र यूनिट में बगावत हो जाती। इसीलिए सोनिया की सबसे बड़ी चुनौती इस समय यही है कि वो गठबंधन की राजनीति से अपनी स्वाभाविक असहजता और महाराष्ट्र में पार्टी को एकजुटता दोनों में कैसे तालमेल बिठा कर रखें।

सोनिया गांधी अगर इसी विरोधाभास को संभालने में लगी हैं तो उधर एनसीपी प्रमुख शरद पवार खांटी राजनीतिक हितों को देखते हुए अपने फैसले कर रहे हैं।

पवार की खांटी राजनीति

महाराष्ट्र में एक वैकल्पिक सरकार के लिए गठबंधन तैयार करने में पवार एक मुख्य प्लेयर की तरह देखे जा रहे थे, लेकिन तभी उन्होंने इस बारे में दोबारा सोचना शुरू किया। अब तक पवार ने अपने सारे पत्ते नहीं खोले हैं लेकिन शिवसेना-कांग्रेस-एनसीपी गठबंधन सरकार के बनने में देरी इस बात की तरफ इशारा कर रहा है कि कुछ तो गड़बड़ है और सोनिया और पवार मिलकर चाहते हैं कि बीजेपी कम से कम एक बार और सरकार बनाने की कोशिश करे।

वैसे देखा जाए तो बीजेपी के पास शिवसेना के साथ मिलकर सरकार बनाने का एक दूसरा मौका तो है ही, या फिर वो पवार के साथ भी हाथ मिला सकती है। या फिर तीसरे विकल्प के तौर पर बीजेपी के विरोधी पार्टी के विधायकों को तोड़ने की संभावना से भी इनकार नहीं किया जा सकता है। पवार इस मामले में माहिर हैं कि सबको भरम में रखने के लिए वो कभी विचारधारा की बात करेंगे तो कभी कॉमन मिनिमम प्रोग्राम की बात करेंगे।

राजनीतिक पिच पर 'दूसरा' फेंकने की पवार की इसी कला के कारण ही तो उन्हें राजनीति में दिग्गज कहा जाता है। दूसरे शब्दों में कहा जाए तो पूरी तरह विश्वास करने योग्य न होना पवार के लंबे राजनीतिक करियर का एक प्रमुख हिस्सा रहा है।
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