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महाराष्ट्र में राष्ट्रपति शासन के आसार, राज्यपाल के पास हैं यह चार विकल्प

न्यूज डेस्क, अमर उजाला, मुंबई Updated Tue, 12 Nov 2019 08:59 AM IST
शरद पवार-उद्धव ठाकरे-देवेंद्र फडणवीस (फाइल फोटो)
शरद पवार-उद्धव ठाकरे-देवेंद्र फडणवीस (फाइल फोटो) - फोटो : PTI
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महाराष्ट्र की सत्ता पर कौन काबिज होगा इसे लेकर संशय बढ़ता जा रहा है। राजनीतिक उठापटक के बीच राज्य में राष्ट्रपति शासन लगाए जाने की अटकलें बढ़ रही हैं। भाजपा सरकार बनाने से पहले ही मना कर चुकी है। वहीं राज्यपाल भगत सिंह कोश्यारी ने सरकार गठन के लिए शिवसेना को और समय देने से मना कर दिया है। जिसके बाद गेंद अब राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (एनसीपी) के पाले में हैं।
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राज्यपाल ने एनसीपी को सरकार बनाने का प्रस्ताव देने के लिए 24 घंटे का समय दिया है। एनसीपी और कांग्रेस ने विधानसभा चुनाव मिलकर लड़ा था और सरकार भी वह मिलकर ही बनाएंगे लेकिन दोनों पार्टियों के पास बहुमत के लिए जरूरी आंकड़ा नहीं है। ऐसे में यदि शिवसेना और अन्य विधायक उसे समर्थन दे दें तो वह सरकार बना सकती है। यदि ऐसा नहीं होता है तो राज्यपाल के पास राष्ट्रपति शासन लगाने के अलावा भी चार विकल्प मौजूद हैं।



संविधान विशेषज्ञों के अनुसार महाराष्ट्र में यदि किसी पार्टी की सरकार नहीं बनती है तो राज्यपाल के पास यह चार विकल्प हो सकते हैं:-

- जब तक कि नया मुख्यमंत्री नहीं मिलता तब तक राज्यपाल मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा दे चुके देवेंद्र फडणवीस को कार्यवाहक मुख्यमंत्री के तौर पर काम करने के लिए कह सकते हैं। संविधान के तहत यह जरूरी नहीं है कि मुख्यमंत्री का कार्यकाल विधानसभा के साथ ही खत्म हो जाए।

- राज्यपाल विधानसभा चुनाव परिणामों में सबसे ज्यादा सीटें जीतने वाली पार्टी के किसी नेता को मुख्यमंत्री बना सकते हैं। ऐसे में भाजपा विधायक मुख्यमंत्री बन सकता है क्योंकि उसके पास सबसे ज्यादा सीटे हैं। मुख्यमंत्री बनने के बाद भाजपा को विधानसभा में बहुमत साबित करना होगा। 

- भगत सिंह कोश्यारी महाराष्ट्र विधानसभा से अपने नेता को चुनाव के जरिए चुनने को कह सकते हैं। ऐसा उच्चतम न्यायालय के एक फैसले के आधार पर हो सकता है। साल 1989 में शीर्ष अदालत ने उत्तर प्रदेश विधानसभा में ऐसा करने का आदेश दिया था।

- यदि इन तीनों विकल्पों के जरिए भी कोई सरकार नहीं बनती है तो राज्यपाल के पास राष्ट्रपति शासन लगाने की सिफारिश के अलावा और कोई चारा नहीं बचता। यह आखिरी विकल्प है। ऐसी स्थिति में राज्य के विधायी कामकाज की बागडोर केंद्र सरकार के हाथ में आ जाएगी।
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