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ओडिशा की राजनीति के पटनायक, राज्य की चार दशक की राजनीति में छाए परिवारों की गाथा

धृतिकाम मोहंती, अमर उजाला, भुवनेश्वर Updated Sun, 21 Apr 2019 06:20 AM IST
नवीन पटनायक (फाइल फोटो)
नवीन पटनायक (फाइल फोटो)
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बीते चार दशक से ओडिशा की सत्ता पटनायक संभाल रहे हैं। पटनायकों की सत्ता की गाथा जानकी बल्लभ पटनायक से शुरू हुई जो 1980 में यहां के मुख्यमंत्री बने। कांग्रेस के पुराने सिपाही और पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के करीबी जेबी ओडिशा में लगातार दो बार मुख्यमंत्री बने। लेकिन, आगे इस कहानी में नए पटनायक आए और पकड़ बनाई। 
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साल 1990 के चुनाव में प्रदेश की जनता ने जेबी को सत्ता से बाहर किया तो दूसरे पटनायक नेता बीजू पटनायक को चुन लिया। लेकिन जनता पार्टी के ये कद्दावर नेता ज्यादा समय सत्ता में नहीं रह सके, 1995 में हुए चुनाव में जेबी ने कांग्रेस को वापसी करवाई और खुद मुख्यमंत्री बने। पहले दो कार्यकाल के मुकाबले इस बार चीजें आसान नहीं रही। एक सिविल सेवा के अधिकारी की पत्नी से हुए सामूहिक दुष्कर्म कांड के बाद 1999 में उन्हें इस्तीफा देना पड़ा और सोनिया गांधी ने उनकी जगह गिरिधर गमंग को सीएम बना दिया था। पीड़िता ने अपने यौन शोषण में सीएम जेबी की भूमिका पर भी सवाल उठाए थे, जिसके बाद कांग्रेस की छवि को भी प्रदेश में काफी नुकसान हुआ।

नए पटनायक के लिए खुला रास्ता

बीजू पटनायक के छोटे बेटे नवीन पटनायक के लिए रास्ता खुला। बीजू पटनायक के निधन के बाद उनके सहयोगी 1997 में नई पार्टी बीजू जनता दल बना चुके थे। इसे आगे बढ़ाने के लिए उन्होंने नवीन को आमंत्रित किया। पिता की विरासत के चलते नवीन इस समय पार्टी के पोस्टर बॉय बन चुके थे और उनकी लोकप्रियता तेजी से बढ़ी। उन्होंने भाजपा को भी अपना सहयोगी बनाया। 1999 के आम चुनाव में वे सांसद बने, लेकिन केंद्र में अटल बिहारी वाजपेयी से मतभेद हुए तो प्रदेश की राजनीति में लौट आए और यहीं ध्यान केंद्रित किया। वर्ष 2000 का विधानसभा चुनाव जीतकर वे सत्ता में आए और इसके बाद से ओडिशा में केवल नवीन पटनायक का ही युग चल रहा है। कंधमाल दंगों के बाद 2009 में भाजपा से नाता तोड़ वे और मजबूत होकर उभरे हैं।

जेबी की विरासत

नवीन पटनायक ओडिशा के सफलतम और लंबे समय तक कायम रहने वाले सीएम बन चुके हैं। जहां बीजू की राजनीतिक विरासत को उनके बेटे नवीन पटनायक ने विस्तार दिया, वहीं जेबी पटनायक की राजनीतिक विरासत को उनके दामाद सौम्यरंजन पटनायक संभाल रहे हैं। बीजू और जेबी राजनीतिक विरोधी रहे और कांग्रेस व जनता दल के रूप में अलग-अलग पार्टियों से उनका ताल्लुक रहा (बीजू ने 1969 में ही कांग्रेस से अलग होकर पहले उत्कल उड़ीसा पार्टी बनाई, जिसका 1977 में जनता दल में विलय हुआ)। लेकिन सौम्य 2018 में कांग्रेस छोड़ बीजेडी में शामिल हो गए। इसी पार्टी से राज्यसभा भेजे गए हैं। अब ओडिशा के बीजू व जेबी की विरासत को सौम्य व नवीन साथ आगे बढ़ा रहे हैं। 

जेबी के बेटे कर चुके चुनाव लड़ने से इनकार

कांग्रेस ने जेबी के बेटे पृथ्वी बल्लभ पटनायक को भी विस सीट बेगुनिया से टिकट दिया था। जेबी इस सीट से चुनाव लड़ते थे,  बल्लभ राजनीति नहीं करना चाहते, इसलिए टिकट नकार दिया। सौम्य के बडे़ भाई निरंजन पटनायक कांग्रेस में हैं, प्रदेश अध्यक्ष बनाए गए। जेबी के समय वे 3 बार कैबिनेट मंत्री रहे। इन विस चुनाव में  घासीपुरा व भंडारी पोखरी से उतरे हैं। उनके बेटे नवज्योति पटनायक कांग्रेस के टिकट पर बालासोर लोक सभा सीट से चुनाव लड़ रहे हैं। 

तीनों की स्थितियां अलग

सौम्य खांडपारा से खड़े हैं, जीत के अवसर अधिक हैं, उनके बड़े भाई निरंजन को कड़ा मुकाबला करना होगा। कांग्रेस के लिए अब बीजद व भाजपा चुनौती बनी हुई है। नवज्योति राजनीति में नए हैं, लेकिन बालासोर कांग्रेस का गढ़ रहा है, यहां नौ बार कांग्रेस प्रत्याशी को जीत मिली है। इसका फायदा मिल सकता है।

नवीन के बाद कौन?

पटनायक राजनीति में नवीन के बाद कौन नेतृत्व करेगा, इसे लेकर संशय है। राजनीतिक गलियारों में चर्चा है कि उनका भतीजा राज पटनायक उत्तराधिकारी के रूप में राजनीति में आ सकता है। उनके बड़े भाई व राज के पिता प्रेम पटनायक भी राजनीति में उतर सकते हैं। हालांकि खुद नवीन ने इसे लेकर कोई संकेत अब तक नहीं दिए हैं। फिलहाल वे प्रदेश की राजनीति में अपनी पकड़ बनाए हुए हैं।

वंशवादी राजनीति की गहरी हैं जड़ें, विभिन्न आंकड़ों से जानिए हालात कैसे

आजादी के करीब 72 वर्षों में से 37 वर्ष यानी आधा समय देश का प्रधानमंत्री नेहरु-गांधी परिवार से रहा। इस बार 18 अप्रैल को वोट देकर पोलिंग बूथ से बाहर निकले कर्नाटक के मुख्यमंत्री ने अपने बयान में कहा कि भारत के सामने इस समय वंशवाद प्रमुख मुद्दा नहीं है, बल्कि इसके और क्षेत्रवाद की वजह से बहुत से राज्यों में विकास हो पाया है। उनका ऐसा बयान भारतीय राजनीति में वंशवादी राजनीति की गहरी पैठी जड़ों और स्वीकार्यता को दर्शाता है। हालांकि खास बात यह है कि बीते चुनावों में इस प्रकार की राजनीति में कमी आई है। 
 
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