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पुण्यतिथि विशेष: महज 18 की उम्र में देश के लिए हंसते-हंसते फांसी के फंदे पर झूल गए थे खुदीराम बोस

भाषा Updated Fri, 10 Aug 2018 03:43 PM IST
Khudiram bose hanged with happiness for country
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उसका बचपन बस बीता ही था, उसके साथी जब पढ़ाई परीक्षा के बारे में सोच रहे थे, वह क्रांति की मशाल रौशन कर रहा था, जिस उम्र में लोग जिंदगी के हसीन ख्वाब बुनते हैं, वह वतन पर निसार होने का जज्बा लिए हाथ में गीता लेकर फांसी के फंदे की तरफ बढ़ गया और देश की आजादी के रास्ते में अपनी शहादत का दीप जलाया। यह था अमर शहीद खुदीराम बोस।
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खुदीराम के बगावती तेवरों से घबराई अंग्रेज सरकार ने मात्र 18 वर्ष की आयु में उन्हें फांसी पर लटका दिया था, लेकिन उनकी शहादत ऐसा कमाल कर गई कि देश में स्वतंत्रता संग्राम के शोले भड़क उठे। बंगाल के जुलाहे एक खास किस्म की धोती बुनने लगे, जिसके किनारे पर ‘खुदीराम’ लिखा रहता था। स्कूल कॉलेजों में पढ़ने वाले लड़के इन धोतियों को पहनकर सीना तानकर आजादी के रास्ते पर चल निकले।

भारतीय स्वाधीनता संग्राम में जान न्यौछावर करने वाले प्रथम सेनानी खुदीराम बोस माने जाते हैं। वह आज ही के दिन यानी 11 अगस्त को केवल 18 साल की उम्र में देश के लिए फांसी के फंदे पर झूल गए थे। उनकी शहादत ने हिंदुस्तानियों में आजादी की जो ललक पैदा की उससे स्वाधीनता आंदोलन को नया बल मिला।

खुदीराम बोस का जन्म बंगाल में मिदनापुर जिले के हबीबपुर गांव में हुआ था। 3 दिसंबर 1889 को जन्मे बोस जब बहुत छोटे थे तभी उनके माता-पिता का निधन हो गया। उनकी बड़ी बहन ने उनको पाला पोसा। बंगाल विभाजन (1905) के बाद खुदीराम बोस मात्र 16 वर्ष की आयु में स्वतंत्रता आंदोलन में कूद पड़े।

हालांकि, वह अपने स्कूली दिनों से ही जलसे-जुलूसों में शामिल होकर ब्रिटिश साम्राज्यवाद के खिलाफ नारे लगाते थे। उन्होंने नौवीं कक्षा में पढ़ाई छोड़कर सिर पर कफन बांध लिया। बाद में वह रेवोल्यूशन पार्टी के सदस्य बने। 28 फरवरी 1906 को पुलिस ने उन्हें इश्तेहार बांटते पहली बार पकड़ा, लेकिन वह भागने में सफल रहे। तीन महीने बाद 16 मई 1906 को वह एक बार फिर गिरफ्तार किए गए, लेकिन उनकी आयु कम होने के कारण उन्हें चेतावनी देकर छोड़ दिया गया।
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