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कौन थे असली 'ठग्स ऑफ हिंदुस्तान' जिनसे अंग्रेज भी डरते थे

बीबीसी हिंदी Updated Fri, 09 Nov 2018 01:47 PM IST
Real Thugs of Hindustan
Real Thugs of Hindustan - फोटो : BBC Hindi
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ठग शब्द सुनते ही लोगों के दिमाग में एक चालाक और मक्कार आदमी की तस्वीर उभरती है जो झांसा देकर कुछ कीमती सामान ठग लेता है लेकिन भारत में 19वीं सदी में जिन ठगों से अंग्रेजों का पाला पड़ा था, वे इतने मामूली लोग नहीं थे।
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ठगों के बारे में सबसे दिलचस्प और पुख्ता जानकारी 1839 में छपी किताब 'कनफेशंस ऑफ ए ठग' से मिलती है। किताब के लेखक पुलिस सुप्रीटेंडेंट फिलिप मीडो टेलर थे लेकिन किताब की भूमिका में उन्होंने बताया है कि उन्होंने 'इसे सिर्फ कलमबंद किया है।'

दरअसल, साढ़े पांच सौ पन्नों की किताब ठगों के एक सरदार आमिर अली खां का 'कनफेशन' यानी इकबालिया बयान है। फिलिप मीडो टेलर ने आमिर अली से जेल में कई दिनों तक बात की और सब कुछ लिखते गए। टेलर के मुताबिक, "ठगों के सरदार ने जो कुछ बताया, उसे मैं तकरीबन शब्दश: लिखता गया, यहां तक कि उसे टोकने या पूछने की जरूरत भी कम ही पड़ती थी।"

आमिर अली का बयान इतना ब्यौरेवार और दिलचस्प है कि वह एक उपन्यास बन गया और छपते ही उसने धूम मचा दी। रूडयार्ड किपलिंग के मशहूर उपन्यास 'किम' (1901) से करीब 60 साल पहले छपी इस किताब एक और खासियत थी कि यह किसी अंग्रेज का नजरिया नहीं बल्कि एक हिंदुस्तानी ठग का 'फर्स्ट पर्सन अकाउंट' है।

टेलर का कहना है कि आमिर अली जैसे सैकड़ों सरगना थे जिनकी देखरेख में ठगी का धंधा चल रहा था। आमिर अली से जब टेलर ने पूछा कि तुमने कितने लोगों को मारा तो उसने मुस्कुराते हुए कहा, "अरे साहब, वो तो मैं पकड़ा गया, नहीं तो हजार पार कर लेता। आप लोगों ने 719 पर ही रोक दिया।"

ठगी का आलम ये था कि अंग्रेजों को इनसे निबटने के लिए एक अलग डिपार्टमेंट बनाना पड़ा था, वही विभाग आगे चलकर इंटेलिजेंस ब्यूरो या आईबी के नाम से जाना गया।

टेलर ने लिखा है, "अवध से लेकर दक्कन तक ठगों का जाल फैला था, उन्हें पकड़ना इसलिए बहुत मुश्किल था क्योंकि वे बहुत खुफिया तरीके से काम करते थे। उन्हें आम लोगों से अलग करने का कोई तरीका ही समझ नहीं आता था। वे अपना काम योजना बनाकर और बेहद चालाकी से करते थे ताकि किसी को शक न हो।"

ठगों से निबटने के लिए बने डिपार्टमेंट के सुपरिटेंडेंट कैप्टन रेनॉल्ड्स ने 1831 से 1837 के बीच ठगों पर हुई कार्रवाइयों का 1838 में ब्योरा दिया था। इस ब्योरे के मुताबिक, पकड़े गए जिन 1059 लोगों का दोष पूरी तरह साबित नहीं हो सका उन्हें दूर मलेशिया के पास पेनांग टापू पर ले जाकर छोड़ दिया गया ताकि वे दोबारा वारदात न कर सकें। इसके अलावा, 412 को फांसी दी गई और 87 को आजीवन कारावास की सजा हुई।
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ठगों की खुफिया रहस्यमय जिंदगी

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