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हिंसा जारी: इस्राइल के पीएम नेतन्याहू झुकने को तैयार नहीं, मंडरा रहा है बड़े संघर्ष का खतरा

शशिधर पाठक, नई दिल्ली/येरुशलम Published by: Jeet Kumar Updated Fri, 14 May 2021 12:59 AM IST

सार

  • दुनिया के देशों की निगाहें इस्राइल-फिलिस्तीन पर
  • अल अक्सा मस्जिद पर इस्राइल की जिद से सहमत नहीं है संयुक्त राष्ट्र की सांस्कृतिक शाखा
  • 2016 में किया था यहूदियों के दावे को खारिज
  • यहूदी, ईसाई और इस्लाम के अनुयायी के लिए पवित्र है क्षेत्र
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इस्राइल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू
इस्राइल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू - फोटो : Social Media

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विस्तार

येरुशलम दुनिया के तीन धर्मों का पवित्र स्थान है। यहूदी, ईसाई और इस्लाम के अनुयायी इसे समान रूप से महत्व देते हैं। तीनों धर्मों को मिलाकर इब्राहिमी भी कहा जाता है। क्योंकि तीनों के मूल में पैगम्बर हजरत इब्राहिम हैं।
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बेतेलहम में ईशा मसीह का जन्म, येरुशलम में सूली पर लटकाया जाना और पैगंबर मोहम्मद साहब की वैत-अल-मुकद्दस से मयीराज की सैर (जन्नत की सैर)। कुब्बत-अल-सखरा (रॉक ऑफ माउंटेन) और यहीं से इस्लामी और यहूदी इसे अपना अपना होने का दावा करते हैं।


हालांकि अक्टूबर 2016 में संयुक्त राष्ट्र की सांस्कृतिक शाखा (यूनेस्को बोर्ड) ने विवादित प्रस्ताव पारित करके अल अक्सा मस्जिद से यहूदियों के दावे को खारिज कर दिया था।  

इस प्रस्ताव में कहा गया था कि अल अक्सा मस्जिद पर यहूदियों के दावे और उनके कोई एतिहासिक प्रमाण नहीं मिलते। लेकिन इस तरह के किसी प्रस्ताव को यहूदी मानने के लिए तैयार नहीं हैं।

दिलचस्प है कि अल अक्सा मस्जिद से यहूदी, ईसाई और इस्लाम के अनुयायी यानी मुसलमान तीनों ताल्लुक रखते हैं। इसे पवित्र मानते हैं। इस्लाम के अनुयायियों के लिए मक्का, मदीना के साथ यह तीसरा सबसे पवित्र स्थल है।

क्या है मूल झगड़े की जड़?
यह दावा यहूदियों का है। यहूदियों का कहना है कि 640 ई. में येरुसलम पर मुस्लिमों का नियंत्रण था। इस दौरान मुस्लिमों ने 957 ई. पूर्व बने उनके पहले टेंपल (मंदिर) पर 691 ई. में गुंबद का निर्माण कराया। इसे ही डोम ऑफ राक्स कहते हैं। 702 ई. में मुसलमानों ने 352 ई.पूर्व बने उनके दूसरे मंदिर के ढांचे और स्थान पर अल-अक्सा मस्जिद का निर्माण कराया।

इसलिए यह क्षेत्र मूल रूप से यहूदियों का पवित्र स्थल है और इस पर उनका अधिकार है। यहूदी इस मस्जिद की पश्चिमी दीवार को पूजते हैं। उनका दावा है कि यह 352 ई. पूर्व बनी थी। इस मस्जिद के नीचे की जमीन को यहूदी, ईसाई और मुसलमान तीनों पवित्र मानते हैं।

इसके एक तरफ फिलिस्तीनी रहते हैं। फिलिस्तीनी हरम-अल-शरीफ में प्रवेश कर सकते हैं और अल अक्सा में नमाज अता कर सकते हैं। यह लंबे समय तक होता आया। लेकिन पिछले कई दशकों से करीब-करीब हर रमजान के समय में यहां टकराव की आशंका बनी रहती है।

इस बार इस्राइल ने फिलिस्तीनियों से इस स्थान को खाली कराना शुरू कर दिया और इसने युद्ध जैसा रूप लेना शुरू कर दिया है। फिलिस्तीनियों के संगठन हमास ने इस्राइल पर पहले 1500 के करीब राकेट बरसाए। इस्राइल ने अपनी तकनीक और एयर डिफेंस के सहारे इस हमले को काफी हद तक बेअसर कर दिया। हमास के कमांडर को मार गिराया। जवाब में हमास ने हमला तेज कर दिया है।

क्या है येरुशलम को लेकर विवाद?
येरुशलम को लेकर झगड़ा बड़ा विचित्र है। इस्राइल इसे अपना मानता है। वह कहता है इस क्षेत्र पर उसका अधिकार है। इसके समानांतर फिलिस्तीनियों ने इसे होने वाले नए स्वतंत्र देश की राजधानी घोषित कर रखा है। अभी फिलिस्तीनियों की इस घोषणा का अर्थ है कि भविष्य में उन्हें स्वतंत्र देश की मान्यता मिलने पर येरुशलम उनकी राजधानी होगी।

ईसाई धर्म के प्रवर्तक प्रभु ईशू को येरुशलम में ही क्रास पर सजा ए मौत दी गई थी। इसलिए यह उनके लिए भी पवित्र स्थल की तरह है। लेकिन बड़ी चतुराई से इस झगड़े को यहूदी बनाम इस्लाम का रूप दे दिया गया है।

बताते हैं कि इससे एक ताना भी जुड़ा है। यह ताना मुसलमानों पर मारा गया था। पहले मुसलमान बैत-अल-मुकद्दस की तरफ मुंह करके नमाज अता करते थे। क्योंकि पांचों वक्त के नमाज का उपदेश और मयीराज की सैर (जन्नत की सैर) पैगंबर मोहम्मद साहब ने यहीं से की थी। लेकिन एक ताने के बाद मुसलमानों ने मक्का की तरफ मुंह करके नमाज अता करना शुरू कर दिया। कहने का अर्थ की यह धार्मिक झगड़ा भी बहुत पुराना है।

पूरी दुनिया की निगाहें इस्राइल-फिलिस्तीन पर
ईसाइयों के धर्म गुरू पोप फ्रांसिस ने शांति और हिंसा से दूर रहने की अपील की है। उन्होंने कहा कि हिंसा से हिंसा ही जन्म लेती है। लेकिन इस्राइल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतेन्याहू ने साफ कर दिया है कि येरुशलम उनके देश की राजधानी है। कोई भी देश अपनी राजधानी के निर्माण के लिए जो करता है, इस्राइल भी वही कर रहा है।

इस्राइल को इसका अधिकार है कि वह इसे आगे भी करता रहेगा। दूसरी तरफ फिलिस्तीनियों के संगठन हमास ने भी हमले तेज करने की घोषणा कर दी है। इस संघर्ष ने सऊदी अरब, तुर्की समेत तमाम देशों को फिलिस्तीन के पक्ष में खड़ा करने की स्थिति में ला दिया है।

पाकिस्तान ने भी फिलिस्तीन के पक्ष में बयान दिया है। माना यह जा रहा है कि ईरान जैसे देश की निगाह भी इस संघर्ष पर टिकी है। रूस, अमेरिका समेत तमाम देशों ने संघर्ष विराम और क्षेत्र में  जल्दी से जल्दी शांति कायम करने की अपील की है।

लेकिन अंतरराष्ट्रीय मामलों के जानकारों का कहना है कि इस बार का टकराव काफी बड़ा संकेत दे रहा है। ऐसा लग रहा है कि हमास ने भी काफी ताकत इकट्ठी की है और अरब देशों के नागरिकों ने जिस तरह से इस्राइल के भीतर यहूदियों पर और यहूदियों ने अरब मूल के लोगों पर पर हमला बोलना शुरू किया है, यह बड़ा रूप ले सकता है। आशंका इसकी भी है कि हमास के इस हमले में कुछ देशों और अंतरराष्ट्रीय ताकतों का भी हाथ हो सकता है।

इस्राइल और हमास दोनों चाहते हैं एक दूसरे का अंत
इस्राइल के हमले में हमास का मुख्य कमांडर मारा गया है। हमास ने इसे कुबूल भी कर लिया, लेकिन हमले की धार कमजोर नहीं की है। हमास के नेता दावा कर रहे हैं कि इस बार अगर इस्राइल ने बड़ा मोर्चा खोला तो उसका नाम अंतरराष्ट्रीय नक्शे से मिट जाएगा।

दूसरी तरफ इस्राइल के नेता बेंजामिन नेतेन्याहू का भी दावा है कि इस्राइल को मजबूर किया गया तो वह उनके देश की सेना फिलिस्तीन और हमास का नाम नक्शे से मिटा देगी। ऐसी स्थिति में दुनिया की निगाहें इस क्षेत्र पर टिकी हैं।

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