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आखिर कैसे मिलकर रह सकते हैं माया और अखिलेश एक साथ?

शशिधर पाठक, अमर उजाला, नई दिल्ली Updated Mon, 24 Jun 2019 07:41 PM IST
मायावती, अखिलेश यादव (फाइल फोटो)
मायावती, अखिलेश यादव (फाइल फोटो) - फोटो : अमर उजाला
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बसपा ने अपनी स्थापना के बाद से कभी सपा, कभी भाजपा, कभी कांग्रेस फिर सपा के साथ गठबंधन किया। इसी तरह से समाजवादी पार्टी ने भी कभी रालोद, कभी कांग्रेस, कभी बसपा और पर्दे के पीछे से भाजपा से तालमेल किया, लेकिन कभी भी दोनों राजनीतिक दलों के गठबंधन के किसी भी राजनीतिक दल के साथ स्थायी नहीं रहे। राजनीति के विश्लेषकों का कहना है कि सपा और बसपा का साथ रहना, गहराई से राजनीतिक तालमेल कर पाना संभव ही नहीं है। क्योंकि बसपा और सपा को सत्ता में पहुंचाने वाले वोटों का आधार और सामाजिक समीकरण करीब, करीब एक है।
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देश की एक मशहूर राजनीतिक सर्वे एजेंसी के लिए मुख्य भूमिका निभाने वाले सूत्र का कहना है कि बसपा के पास जाटव और सपा के पास यादव हैं। इसके बाद जितनी भी अन्य पिछड़ा वर्ग से लेकर दलित जातियां (अनुसूचित और अनुसूचित जनजाति) और अल्पसंख्यक हैं उन पर दोनों ही राजनातिक दलों की निगाह हैं। दोनों ही राजनीतिक दल कांग्रेस की राजनीतिक व्यवस्था के विरोध में खड़े हुए हैं। 90 दशक से सपा और बसपा करीब 25 साल तक एक दूसरे के विरोध की राजनीति कर रहे हैं। ऐसे में अचानक लोकसभा चुनाव से ऐन पहले दोनों का मिलना मतदाताओं को भी हजम नहीं हो पाया। 

यह तो पहले से पता था : पीएल पूनिया


कांग्रेस के वरिष्ठ नेता पीएल पूनिया बसपा प्रमुख मायावती के मुख्यमंत्री रहने के दौरान उनकी नाक के बाल माने जाते थे। पूनिया बसपा और बसपा प्रमुख की राजनीति को भी बखूबी समझते हैं। पूनिया का कहना है कि बसपा और सपा का यह बेमेल मिलन था। पूनिया कहते हैं कि यह केवल लोकसभा चुनाव का अवसर भुनाने के लिए हुआ तालमेल था। चुनाव खत्म हो गया तो तालमेल भी खत्म हो गया। यह तो होना ही था। लेकिन पूनिया का कहना है कि लेकिन इस तरह का खेल अधिक दिनों तक नहीं चलने वाला है। देश की जनता अब सबकुछ जान-समझ रही है।

मुझे आश्चर्य नहीं : शिप प्रताप शुक्ला


मोदी सरकार-1 में केंद्रीय वित्त राज्यमंत्री रहे शिवप्रताप शुक्ला का कहना है कि सपा-बसपा के अलग होने पर उन्हें कोई आश्चर्य नहीं है। शिव प्रताप का कहना है कि लोकसभा चुनाव प्रचार के दौरान ही प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ और भाजपा अध्यक्ष अमित शाह ने इस गठबंधन की भविष्यवाणी कर दी थी। शिव प्रताप के अनुसार प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की लोकप्रियता से घबराकर दोनों राजनीतिक दलों ने लोकसभा चुनाव में सीटें पाने के लिए गठबंधन किया था। अब उनकी उम्मीदों पर पानी फिर गया तो अलग हो रहे हैं। भाजपा नेता जीवीएल नरसिंहा का भी कहना है कि यह एक अवसरवादी गठबंधन था। चुनाव के लिए बना था और चुनाव बाद टूट गया। 

मायावती अस्थिर सोच की नेता


समाजवादी पार्टी के एक राज्यसभा सदस्य ने कहा कि बसपा नेता अस्थिर स्वभाव की नेता हैं। उन्होंने कहा कि इस बारे में पार्टी ने अधिकारिक राय दे दी है, इसलिए वह ऑन दि रिकार्ड कुछ नहीं कहना चाहते। सूत्र का कहना है कि अखिलेश ने मायावती को जरूरत से ज्यादा सम्मान दे दिया था। सपा प्रमुख की पत्नी ने चुनाव सभा में मंच पर मायावती का पैर छूकर आशीर्वाद लिया था। मायावती ने सपा-बसपा गठबंधन को स्वाभाविक, लंबे समय वाला, विधानसभा चुनाव में भी साथ रहने वाला बताया था। अब वह अपना असली रूप दिखा रही हैं। सपा नेता का कहना है कि उनकी पार्टी का चरित्र नहीं है। इसलिए इस विषय पर सपा प्रमुख अखिलेश यादव ने अभी तक मुंह नहीं खोला है। 

बसपा के नेता चुप हैं


संसद भवन परिसर में बसपा के नेता अभी इस मुद्दे कुछ नहीं बोल रहे हैं। उनका कहना है कि बहन जी (मायावती) खुद गठबंधन को लेकर बता रही हैं। वह कारण भी बता रही हैं और समाजवादी पार्टी का रवैय्या भी। इसलिए इस विषय पर उनका बोलना ठीक नहीं है। वहीं सपा के नेताओं का कहना है कि बसपा पर दबाव है। एक बाद एक नए मामले में एफआईआर भी सपा-बसपा गठबंधन के टूटने का करण हो सकता है।  

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