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आजादी का अमृत महोत्सव: ज्ञानेंद्र बोले- नई पीढ़ी को अगस्त क्रांति के वीरों के बलिदान से अवगत कराने की जरूरत

न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली। Published by: देव कश्यप Updated Wed, 10 Aug 2022 12:52 AM IST
सार

समारोह में वरिष्ठ पत्रकार, लेखक, स्तंभकार एवं पर्यावरणविद ज्ञानेन्द्र रावत ने अपने संबोधन में देश के प्रथम स्वतंत्रता आंदोलन से लेकर भारत छोड़ो आंदोलन तक में अपना सर्वस्व न्योछावर करने वाले बलिदानियों की चर्चा की।

आजादी के अमृत महोत्सव के मौके पर समारोह का आयोजन।
आजादी के अमृत महोत्सव के मौके पर समारोह का आयोजन। - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार

आजादी के अमृत महोत्सव के अवसर पर बीते आठ अगस्त को 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन के नायकों की स्मृति में नई दिल्ली स्थित इंडिया इंटरनेशनल सेंटर के कमला देवी सभागार में एक समारोह का आयोजन किया गया।



समारोह की शुरुआत में अतिथियों द्वारा दीप प्रज्वलन के साथ हुआ। समारोह की शुरुआत में प्रख्यात संगीतकार जनाब जौहर अली खान के राष्ट्र प्रेम की गीत-ध्वनि और संगीत लहरी और प्रख्यात नृत्यांगना डॉ. सुमिता दत्त राय की भावभीनी नृत्य प्रस्तुति ने सभी उपस्थित जनों को मंत्रमुग्ध कर दिया। समारोह में उपस्थित विशिष्ठ जनों - प्रख्यात पत्रकार एवं वैदेशिक मामलों के विशेषज्ञ डॉ. वेद प्रताप वैदिक, भारत सरकार के पूर्व सचिव आईएएस एवं पंचगव्य विद्यापीठ के उपकुलपति डॉ. कमल टावरी, अंतरराष्ट्रीय सहयोग परिषद के निदेशक नारायण कुमार, सुप्रीम कोर्ट के अपर महाधिवक्ता संजीव सहगल, प्रख्यात समाजवादी नेता और चिंतक रघु ठाकुर, साहित्यकार अलका सिन्हा, इतिहासकार डॉ. संतोष कुमार पटैरिया, पूर्व केंद्रीय मंत्री संजय पासवान, पूर्व सांसद संतोष भारतीय और सूरज मंडल, प्रख्यात लेखक शाहनवाज कादरी, संगीतकार जौहर अली खान व प्रसिद्ध नृत्यांगना डॉ. सुमिता दत्त राय समेत अन्य का लोकनायक जयप्रकाश अंतरराष्ट्रीय अध्ययन विकास केंद्र के महासचिव व समारोह के आयोजक अभय सिन्हा और आयोजन स्वागत समिति के प्रमुख बालाजी ग्रुप ऑफ एजुकेशन के निदेशक डॉ. जगदीश चौधरी ने स्मृति चिन्ह देकर स्वागत किया।


इसके बाद स्व. कन्हैयालाल खरे द्बारा रचित खण्ड काव्य 'क्रांतिकारी दुर्गा भाभी' नामक पुस्तक का विशिष्ठ अतिथियों द्वारा विमोचन किया गया। इसके बाद समारोह के आयोजक अभय सिन्हा ने सभी अतिथियों-आगंतुकों का स्वागत करते हुए अगस्त क्रांति के भूले-विसरे नायकों की स्मृति में किए जा रहे इस आयोजन के कारणों पर प्रकाश डाला और आयोजन में सहयोग-समर्थन देने वाले सहयोगियों का आभार व्यक्त किया। उन्होंने आंदोलन में बलिदान देने वाले सेनानियों की सिलसिलेवार चर्चा की और आश्वस्त किया कि लोकनायक जयप्रकाश अंतरराष्ट्रीय अध्ययन विकास केंद्र देश के आजादी के आंदोलन के भूले विसरे नायकों की स्मृति को जीवंत बनाये रखने के अभियान को जारी रखेगा।

समारोह में जहां डॉ. वेद प्रताप वैदिक ने अगस्त क्रांति के नायकों के व्यक्तित्व व कृतित्व पर प्रकाश डाला और आजादी के उपरांत उनकी उपेक्षा का सिलसिलेवार वर्णन किया और उनकी स्मृति में स्मारक, केन्द्रों की स्थापना पर बल दिया। साथ ही ऐसे आयोजनों की आवश्यकता को समय की मांग बताया। वहीं, समाजवादी चिंतक रघु ठाकुर ने आजादी के आंदोलन के नेताओं की भूमिका, गांधी, लोहिया, जयप्रकाश के सपनों के आजाद भारत में हो रहे ह्वास और देश के करोड़ों लोगों की आशाओं के धूल-धूसरित होने के कारणों का व्यौरेवार खुलासा किया। उन्होंने फिर से नौजवानों को उठकर खडे़ होने की जरूरत पर बल दिया और कहा कि अब बहुत हो चुका। यदि देश बचाना है तो गांधी, लोहिया, जयप्रकाश का बताया रास्ता ही एकमात्र उपाय है तभी सच्ची आजादी संभव है।

संजय पासवान ने आजादी के दीवानों को देश की धरोहर करार दिया। समारोह में लखनऊ से आये प्रख्यात समाजवादी नेता लोकबंधु राजनारायण के सहयोगी व ख्यातनामा पुस्तक लहू पुकारेगा के लेखक शाहनवाज कादरी ने भारत छोड़ो आंदोलन की पृष्ठभूमि व उसके नेताओं की भूमिका पर सिलसिलेवार प्रकाश डाला, वहीं महोबा से आये प्रख्यात इतिहासकार डॉ. संतोष कुमार पटैरिया ने देश की आजादी में भारत छोड़ो आंदोलन के महत्व और आंदोलनकारियों के योगदान की क्षेत्रवार व्याख्या की। 

समारोह में वरिष्ठ पत्रकार, लेखक, स्तंभकार एवं पर्यावरणविद ज्ञानेन्द्र रावत ने अपने संबोधन में देश के प्रथम स्वतंत्रता आंदोलन से लेकर भारत छोड़ो आंदोलन तक में अपना सर्वस्व न्योछावर करने वाले बलिदानियों की चर्चा की। उन्होंने दुख व्यक्त करते हुए कहा कि जिनके असंख्य बलिदानों की कीमत पर आज हम खुली हवा में सांस ले रहे हैं, उनको आज हम बिसार चुके हैं। आज उनके त्याग और बलिदान से आज की पीढ़ी अनजान है। एक षड्यंत्र के तहत उनके बलिदान को भुलाने का काम किया गया है। इसे हमें समझना होगा। सबसे बड़ा दुख तो यह है कि जिस झंडे को लेकर आजादी के संघर्ष के दौर में आठ से 14 साल के नौनिहालों ने अंग्रेज रेजिडेंसियों पर फहराने की खातिर बरतानिया हुकूमत के सैनिकों की गोलियां खायीं, उनका नाम लेने वाला भी कोई नहीं है।

उन्होंने कहा कि यही नहीं जिस झंडागीत को गाते हुए आजादी के दीवाने हजारों की संख्या में सड़कों कर निकल पड़ते थे, उस "झंडा ऊंचा रहे हमारा, विजयी विश्व तिरंगा प्यारा" गीत के रचयिता श्यामलाल गुप्त पार्षद को अभावों में जीना पड़ा। वह अलग बात है कि उनको पद्मश्री से सम्मानित किया गया, लेकिन अंत समय में उनके पार्थिव शरीर को शासन ने वाहन तक मुहैया नहीं कराया। न प्रदेश सरकार का कोई मंत्री उनके संस्कार में ही शामिल हुआ। सिर्फ कानपुरवासियों ने उनका अंतिम संस्कार पूरे सम्मान से किया। यह बडे़ शर्म की बात है कि जिन आजादी के सेनानियों की कुर्बानी की बदौलत आज हम आजाद हैं, उनके परिवारों की सुध लेने वाला कोई नहीं है। असलियत में आज का दिन उनकी स्मृति का दिन है। हमारा दायित्व है कि हम उन बलिदानियों के बलिदान को जीवंत बनाये रखें। उनको विस्मृत न होने दें और उनके बलिदान से नयी पीढ़ी को अवगत करायें। यही हमारी उनको सबसे बड़ी श्रद्धांजलि होगी।

समारोह के अंत में स्वागत समिति के अध्यक्ष डॉ. जगदीश चौधरी ने इस आयोजन के मान्य अतिथियों का आभार व्यक्त किया और कहा कि हमारी पीढ़ी का यह दायित्व है कि हम अपने उन वीरों, जिन्होंने हमारे जीवन को सुखी बनाने के लिए अपना सर्वस्व देश के लिए न्यौछावर कर दिया, उनके बलिदान को न केवल याद करें बल्कि नयी पीढ़ी को उससे अवगत भी कराएं। 

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