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कुत्ते, बिल्ली और बाज पर आफत बना सरकार का फरमान, गौवंशी भैरव व शिवा भी हैं परेशान!

डिजिटल ब्यूरो, अमर उजाला, नई दिल्ली Updated Fri, 24 Jan 2020 07:14 PM IST
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Jackal and Eagle
Jackal and Eagle - फोटो : AmarUjala
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प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के लोकसभा क्षेत्र वाराणसी में लड्डू, चीनी, चंपा, लौकी, जैकी और भैरव के साथ-साथ शिवा और भंडारी भी परेशान हैं। इन सब पर मोदी सरकार का एक कानून आफत बनकर टूटा है। इनमें से कोई घायल है, तो किसी की तबीयत खराब है। जो ठीक हो रहा है, उसे कोई अपनाने को तैयार नहीं।
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यहां बात हो रही है गलियों में लावारिस घूम रहे कुत्ते, बिल्ली, बाज, बछड़े और बैल की। ऊपर जो नाम दिए गए हैं, वे इन्हीं के हैं। ये सब पशु-पक्षी वाराणसी के सिकरौल में स्थित एक घर में रह रहे हैं। एचआर में एमबीए स्वाति खुद की पॉकेट मनी से इन सभी 35 जीवों का अपने घर पर इलाज कर रही हैं।

बतौर स्वाति, विदेशों में रह रहे कई व्यक्ति आर्थिक मदद देने को तैयार हैं, लेकिन फॉरेन कंट्रीब्यूशन (रेगुलेशन) एक्ट (एफसीआरए)- 2010 में रमैया चेरिटेबल ट्रस्ट का रजिस्ट्रेशन नहीं हो रहा। केंद्रीय गृह मंत्रालय की एफसीआरए विंग ने इनका आवेदन रिजेक्ट कर दिया है। दोबारा से आवेदन करने के लिए कहा गया है। वह प्रक्रिया भी छह माह बाद ही शुरू हो सकेगी।


स्वाति का कहना है कि वे करीब 20 साल से लावारिस पशु पक्षियों की देखभाल करती हैं। पहले मेरे मां बाप इन सब पर खर्च करते रहे और अब मैं जो थोड़ा बहुत कमाती हूं, वो सब इन जानवरों की देखभाल पर खर्च हो रहा है। अभी मेरे घर पर 18 कुत्ते, जो शहर के विभिन्न हिस्सों में घायल पड़े हुए थे, उन्हें यहां लाया गया है। 13 बिल्लियां और एक बाज भी है, जिसे पतंग की डोर ने घायल कर दिया था।

गौवंश परिवार से एक सांड़, दो बैल और एक बछड़ा है। इन सभी को भी शहर के विभिन्न हिस्सों से घायल अवस्था में यहां पर लाया गया था। इन्हें किसी अज्ञात वाहन ने टक्कर मार दी थी। कुछ चिड़ियां भी थीं, लेकिन ठीक होने के बाद उन्हें उड़ा दिया गया।
 
हालांकि अब इनमें से अधिकांश जानवर ठीक हो चुके हैं, लेकिन कोई भी संस्था या व्यक्ति इन्हें अपनाने के लिए तैयार नहीं है। जैसे, कुत्ते और बिल्लियां ठीक हैं, मगर लोग कहते हैं कि वे गलियों में आवारा घूमने वाले जानवर हैं, इन्हें हम नहीं रखेंगे।

स्वाति बताती हैं कि ये जानवर ठीक हैं, लेकिन कहीं जाने को तैयार नहीं हैं। इनके साथ मुझे भी लगाव हो गया है। यह अलग बात है कि इनकी खुराक बहुत भारी पड़ रही है। गौवंश के लिए रोजाना बाहर से चारा मंगाना पड़ता है।

मौके पर ही इलाज करने की कोशिश

स्वाति के अनुसार, हमारा प्रयास रहता है कि किसी भी घायल जानवर का वहीं पहुंच कर इलाज किया जाए। वजह, यदि एक बार कोई जानवर घर पर आ जाता है, तो वह ठीक होने के बाद जाने के लिए तैयार नहीं होता। एक घायल सियार को इलाज के बाद जंगल में छोड़ दिया गया था। हमारे पास 35 वालंटियर हैं। जैसे ही हमारे पास किसी जानवर या पक्षी के घायल होने की कॉल आती है, हम डॉक्टर लेकर वहां पहुंच जाते हैं।

शहर के एक डॉक्टर हमारी मदद कर रहे हैं। जब आर्थिक मदद का कोई दूसरा जरिया नहीं मिला, तो फरवरी 2017 में ट्रस्ट बनाया। विदेशी लोगों ने अब मदद की बात कही, तो गृह मंत्रालय की मंजूरी नहीं मिली। जब तक पंजीकरण नहीं होता, तब तक बाहर से आर्थिक मदद नहीं मिलेगी। अब दोबारा छह महीने बाद आवेदन करना होगा। हो सकता है कि तब तक कई जानवर यहां से चले जाएं।
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