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चुनावी राज्यों के लिए भाजपा की रणनीति, कृषि मुद्दों पर बचाव नहीं करेगी पार्टी

डिजिटल ब्यूरो, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: Harendra Chaudhary Updated Wed, 03 Mar 2021 06:11 PM IST

सार

भाजपा किसानों को लेकर हर राज्य की भाषाओं में एक किताब तैयार की जा रही है। इसमें कानूनों के फायदे बताए गए हैं। इसके अलावा भाजपा शासित राज्यों में किसानों के लिए क्या कदम उठाए गए हैं वह भी लोगों को बताया जा रहा है...
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पश्चिम बंगाल में भाजपा अध्यक्ष जेपी नड्डा
पश्चिम बंगाल में भाजपा अध्यक्ष जेपी नड्डा - फोटो : PTI (फाइल फोटो)

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विस्तार

नए कृषि कानूनों का विरोध कर रहे किसान संगठन अब आगामी पांच राज्यों में किसान महापंचायत और रैली कर केंद्र सरकार के खिलाफ बिगुल फूंकने की तैयारी कर रहे हैं। इधर, किसान संगठनों को जवाब देने के लिए भाजपा ने भी कमर कस ली है। पार्टी के नेता और सांसद इन चुनावों में नए कृषि कानूनों के फायदे लोगों को बताएंगे, वहीं हर जिला स्तर पर किसान मोर्चा किसानों और लोगों को जोड़ने के लिए बैठक और रैली करेगा।
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भाजपा के एक वरिष्ठ उपाध्यक्ष ने अमर उजाला से कहा कि तीन माह पहले से आंदोलन चल रहा है। लेकिन इसका सबसे ज्यादा असर हरियाणा, पंजाब और पश्चिमी उत्तर प्रदेश में ही देखने को मिल रहा है। असम, पश्चिम बंगाल, तमिलनाडु, केरल में किसान आंदोलन का कोई भी असर नहीं है। पश्चिम बंगाल और कर्नाटक में एक या दो रैलियां हुईं, लेकिन वह भी वामदलों ने ही आयोजित की थीं, जो किसान रैली कम और राजनैतिक रैली ज्यादा थी। इसलिए अगर किसान यहां रैली करते भी हैं तो पार्टी को कोई नुकसान नहीं होगा।


जहां तक नए कृषि कानूनों के विरोध का सवाल है तो ये देश भर में कोई मुद्दा है नहीं। विपक्षी पार्टियों ने कई राज्यों में इसे मुद्दा बनाया, इसके बाद भी किसानों ने भाजपा का ही साथ दिया। चुनावों में पार्टी को अच्छी जीत हासिल हुई। अब देश में जो मुद्दा ही नहीं है उसका बचाव क्यों करें। चुनाव में भाजपा सोनार बांग्ला और विकास के मुद्दों पर ही फोकस रखेगी।

भाजपा नेता के मुताबिक किसानों को लेकर हर राज्य की भाषाओं में एक किताब तैयार की जा रही है। इसमें कानूनों के फायदे बताए गए हैं। इसके अलावा भाजपा शासित राज्यों में किसानों के लिए क्या कदम उठाए गए हैं वह भी लोगों को बताया जा रहा है। वहीं हमारे विधायक, सांसद और पार्षद पहले ही किसानों के साथ बैठक कर चुके हैं। आने वाले दिनों में पार्टी के कार्यकर्ताओं की टीम किसानों के बीच जाकर प्रचार करेगी।

सेंटर फॉर द स्टडी ऑफ डेवलपिंग सोसायटी (सीएसडीएस) में राजनीतिक शोधकर्ता मंजेश राणा ने अमर उजाला को बताया कि कृषि कानूनों का सबसे ज्यादा विरोध हरियाणा, पंजाब और उत्तर प्रदेश में ही देखने को मिल रहा है। चुनावी राज्यों में इसका कोई असर नहीं होगा, क्योंकि यहां की खेती और किसानों में बहुत फर्क है। लेकिन आंदोलन को जिंदा रखने के लिए किसानों का निर्णय अच्छा है। अब ये असम में कांग्रेस और पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी पर निर्भर करता है कि वो किसानों के मुद्दों को कितनी अहमियत देते हैं।

राणा ने कहा कि भाजपा पर इसका कोई खास असर नहीं पड़ेगा। असम और पश्चिम बंगाल में सीएए और एनआरसी बड़ा मुद्दा बनेगा। वैसे भाजपा बंगाल के चुनावों में सोनार बांग्ला, विकास, ममता बनर्जी के शासन काल की कमियों को ही भुनाएगी। पार्टी इन चुनावों में कृषि कानूनों के विरोध का ज्यादा जिक्र नहीं करेगी क्योंकि उन्हें पता है कि देश के कुछ हिस्सों में इसका विरोध हो रहा है। लेकिन चुनावों में विपक्षी पार्टियां अगर कृषि कानूनों के मुद्दे को जोर शोर से उठाती हैं तो फिर भाजपा को इसका काउंटर करना पड़ेगा।

भाजपा के राष्ट्रीय प्रवक्ता सरदार आरपी सिंह ने अमर उजाला से कहा किसानों की चुनावों में रैली और प्रदर्शन करने के फैसले से ये पूरी तरह से साफ हो गया है कि राजनीतिक दल इसके पीछे हैं। हम लोग भी राजनीतिक तरीके से ही इनसे डील करेंगे। जिन चुनावी राज्यों में किसान संगठनों ने रैली करने की बात की पहले वो ये तो देखें कि वहां कानूनों के विरोध में कोई आंदोलन हुआ है भी या नहीं।  

किसान नेता हन्नान मौला कहते हैं कि किसान संगठन जब पूरे देश में महापंचायत और रैली कर रहे हैं तो पांच चुनावी राज्यों को क्यों छोड़ सकते हैं। हम सभी राज्यों में जिस तरह से अपनी बात किसानों और लोगों के बीच जाकर रख रहे हैं ठीक उसी तरह इन राज्यों में भी रखेंगे। 15 मार्च को केरल और 12 मार्च को पश्चिम बंगाल में रैली करेंगे। अब ये राज्य किसान संगठन तय करेंगे कि कितनी रैली कब और कहां होनी चाहिए।

गौरतलब है कि संयुक्त किसान मोर्चा ने मंगलवार को एक बड़ा एलान करते हुए कहा कि बंगाल में 12 मार्च को किसानों की विशाल रैली होगी। इसके अलावा बंगाल समेत उन सभी राज्यों में संयुक्त किसान मोर्चा भाजपा का विरोध करेगा जहां कुछ ही समय बाद चुनाव होने हैं।

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