रेप के झूठे सबूत का सच ऐसे आया सामने, कोर्ट ने पूछा- क्यों न मिले सजा

न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली Updated Sat, 09 Jun 2018 02:39 PM IST
प्रतीकात्मक तस्वीर
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एक फास्ट ट्रैक कोर्ट ने कथित तौर बलात्कार पीड़ित को नोटिस जारी कर पूछा है कि अपने यौन उत्पीड़न के बारे में झूठ बोलने के लिए उसे क्यों नहीं दंडित नहीं किया जाना चाहिए। घटना के सीसीटीवी फुटेज को देखने के बाद कोर्ट शुक्रवार को इस नतीजे पर पहुंची कि उसके और आरोपी के बीच यौन संबंध अपसी सहमति से बने थे। 
जज अनु ग्रोवर बलिगा कथित घटनास्थल के सीसीटीवी कैमरों के फुटेज के आधार पर नतीजे पर पुहंचीं। जज ने कहा, "आरोप लगाने वाली महिला वीडियो फुटेज में आरोपी को गले लगाते और चुंबन लेते हुए और खुद के कपड़े खोलती हुई देखी जा सकती है।" फुटेज से यह स्पष्ट होता है कि आरोपी पुरूष और आरोप लगाने वाली महिला के बीच आपसी सहमति से यौन संबंध बना था।"

जज ने कहा, "वैज्ञानिक सबूत यह स्पष्ट रूप से साबित करते हैं कि अभियोजन पक्ष ने आरोपी पर उनसे बलात्कार करने का झूठा आरोप लगाया है।" नई दिल्ली के रहनेवाले आरोपी को बरी करते हुए अदालत ने यह भी कहा कि झूठे सबूत देने के लिए महिला को "दंडित किया जाना चाहिए।" 

महिला के मुताबिक, 2007 में तलाक लेने के तुरंत बाद, वह एक वैवाहिक पोर्टल पर एक आदमी के संपर्क में आई। महिला ने अपने और अपनी बेटी के रहने के लिए, उस अभियुक्त पुरूष के नाम पर एक फ्लैट किराए पर लिया। 19 मार्च 2013 को उसे घर खाली करने के लिए मकान मालिक का नोटिस मिला। चूंकि रेंट एग्रीमेंट अभियुक्त के नाम पर था, इसलिए वह उसके कार्यालय-सह-घर में गई, जहां उसने आरोप लगाया कि उस आदमी ने उसे कॉफी की पेशकश की। कॉफी पीने पीने के बाद वह बेहोश हो गई, और जब उसे होश आया तो उसने खुद को अधनंगी पाया और उसके जननांगों में एक टिश्यू पेपर था। 
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आदमी ने किया यह खुलासा

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