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भारत में जलवायु 'आपातकाल' के हालात, सख्ती से लागू हों कानूनः भूरेलाल

जितेंद्र भारद्वाज, अमर उजाला Updated Sat, 21 Sep 2019 12:22 PM IST
Bhure lal EPCA
Bhure lal EPCA - फोटो : AmarUjala
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एनवायरनमेंट पॉल्यूशन (प्रीवेंशन एंड कंट्रोल) अथॉरिटी के चेयरमैन डॉ. भूरेलाल ने अमर उजाला डॉट कॉम के साथ बातचीत में साफतौर पर कह दिया है कि जो लोग ये सोचते हैं कि भारत में जलवायु परिवर्तन हो रहा है, वह पूरी तरह गलत है। हमारे देश में जलवायु आपातकाल के हालात बन गए हैं। आप खुद ही देख लें कि कहीं पर पानी इतना नीचे जा रहा है, तो कहीं पर एक खुदाई में ही पानी निकल आता है। आधे राज्य बाढ़ की भयंकर चपेट में हैं, तो बाकी के राज्यों में सूखा पड़ा है।

बच्चों को घटिया क्वॉलिटी के मास्क

उन्होंने कहा कि पर्यावरण की भयावह स्थिति से कौन अवगत नहीं है, सांस तक लेने में दिक्कत आ रही है। दूसरी ओर, सुप्रीम कोर्ट के पूर्व जस्टिस एवं एनजीटी के पूर्व चेयरमैन स्वतंत्र कुमार ने कहा  कि देश में कानून पर्याप्त हैं, केवल उन्हें सख्ताई से लागू करने की जरुरत है। उन्होंने खुलासा किया कि दिल्ली में स्कूली बच्चों को पर्यावरण से बचने के लिए जो मॉस्क दिए जाते वे ठीक क्वालिटी के नहीं हैं। ये मॉस्क इस तरह बने होते हैं कि उससे बच्चे प्रदूषण से बचने की बजाए उल्टा सांस एवं वायु जनित दूसरी बीमारियों से ग्रसित हो जाते हैं। इनमें लगे एयर फिल्टर किसी भी मापदंड पर खरा नहीं उतरते।

जलवायु परिवर्तन पर जागरूकता नहीं

जस्टिस स्वतंत्र कुमार और डॉ. भूरे लाल शुक्रवार को कॉन्स्टीटयूशन क्लब में 'क्लाइमेट इमरजेंसी' विषय पर आयोजित एक सेमिनार में भाग लेने पहुंचे थे। यह सेमिनार काउंसिल फॉर ग्रीन रिवॉल्यूशन, संगठन ने आयोजित की थी। इस मौके पर जस्टिस स्वतंत्र कुमार ने कहा कि हमारे देश में पर्यावरण विषय को एक तकनीकी विषय माना जाता है। बहुत से लोगों की सोच है कि यह सामान्य लोगों के दायरे का विषय है ही नहीं। ये बात गलत है। इस विषय को आम लोगों का विषय बनाना चाहिए। समाज में जलवायु परिवर्तन कह कर बहस टाल दी जाती है। इसे लोग 'ओके' कह कर आगे बढ़ जाते हैं।

सोच बदलना सबसे ज्यादा जरुरी

जस्टिस स्वतंत्र कुमार ने कहा कि न्यायिक हस्तक्षेप अपनी जगह है। ये ठीक है कि इससे बहुत कुछ हो सकता है, अदालतों ने कई ऐसे फैसले दिए हैं, कई बार उन पर ऐतराज भी हो जाता है। जैसे मैने बतौर एनजीटी चेयरमैन मनाली-रोहतांग बाबत जो फैसला दिया, वह बहुत से लोगों को रास नहीं आया, लेकिन यह जरुरी था। पर्यटकों की भीड़ रोहतांग पर बने ग्लेशियर को पिघला रही थी। वहां पर्यावरण को भारी नुकसान पहुंच रहा था, लेकिन किसी को कोई परवाह नहीं थी।

पूर्व जस्टिस स्वतंत्र कुमार ने दिए ये सुझाव...

  • हम सभी तरह के एक्ट बना चुके हैं, कानून पर्याप्त है, लेकिन इन्हें प्रभावी तौर लागू किया जाना चाहिए।
  • राष्ट्रीयता का पालन करें, लेकिन जमीनी स्तर पर सोचें। क्योंकि पर्यावरण किसी एक शहर, राज्य या राष्ट्र का विषय नहीं है
  • लोगों को अपनी सोच बदलनी होगी, लाइफ स्टाइल बदलना होगा
  • पर्यावरण को बेहतर बनाने के लिए सामुदायिकता और संयुक्त स्तर के प्रयास करने होंगे
  • प्राकृतिक स्रोत का आर्थिक दोहन न करें 
  • वाटर बॉडी के लिए संरक्षण, बहाली और कायाकल्प, इन तीनों पर लगातार काम करना होगा 
  • रेन वाटर हार्वेस्टिंग सिस्टम को जमीनी स्तर पर लागू करना होगा 
  • ये आपको सोचना है कि देश में फाइव स्टार अस्पताल बनें या हम कुछ ऐसा सोचें कि लोग बीमार ही न हों 

समुद्र में बढ़ रहा सुनामी का खतरा

एनवायरनमेंट पॉल्यूशन प्रीवेंशन एंड कंट्रोल अथॉरिटी के चेयरमैन डॉ. भूरेलाल ने कहा, हम समुद्र के बारे में कुछ नहीं सोचते। हजारों किलोमीटर की आइसलैंड खत्म होती जा रही है। आज हालत यह है कि समुद्र भी सुनामी के रूप में जीवन और मौत की लड़ाई में शामिल हो गया है। आने वाले समय में यह सुनामी बढ़ती ही जाएगी। यह पर्यावरण के साथ खिलवाड़ का नतीजा है। सड़क पर चल रहे वाहन दर्जनों तरह की हानिकारक गैस छोड़ते हैं, आगे तापमान बढ़ता जाएगा और कृषि उत्पादन कम होगा। खारा पानी बढ़ेगा और वह जमीन को खराब कर देगा। अगर इन सबसे बचना है, तो अधिक से अधिक पेड़ लगाने होंगे, साथ ही रिसाइकिल तकनीक को अपनाना होगा।
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