सेनाधिकारी पिता की आकांक्षा सेना में चयन के मानकों को परिभाषित नहीं करता: दिल्ली हाईकोर्ट

न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली Updated Thu, 01 Oct 2020 03:22 AM IST
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delhi high court - फोटो : PTI

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दिल्ली हाईकोर्ट ने बुधवार को अपने एक अहम फैसले में कहा कि एक पिता की आकांक्षा सेना में अधिकारी के रूप में चयन के मानकों को परिभाषित नहीं करता है। हाईकोर्ट ने सेना की जीवन शैली के उपयुक्त नहीं पाए जाने पर एक उम्मीदवार को भारतीय सेना अकादमी (आईएमए) में वापस लेने का निर्देश देने से इनकार कर दिया।
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सेना में लेफ्टिनेंट कर्नल का बेटा जुलाई, 2017 में आईएमए में कमीशन पूर्व प्रशिक्षण के लिए शामिल हुआ था, ताकि सेना में अधिकारी बन सके। नवंबर 2019 में उसे आईएमए से हटाने का आदेश दिया गया। आईएमए से हटाए गए उम्मीदवार के पिता सेना में शीर्ष अधिकारी हैं और अपने बेटे के प्रति नरम रुख अपनाने के लिए हाईकोर्ट से अपील की थी।
उन्होंने कहा था कि सेना में उनके बेटे का अधिकारी बनना उनके लिए काफी मायने रखता है, क्योंकि उनके परिवार की चौथी पीढ़ी से कोई सेना में शामिल हो रहा है।
मामले की सुनवाई करते हुए जस्टिस राजीव सहाय एंडलॉ और जस्टिस आशा मेनन की पीठ ने कहा, हम लेफ्टिनेंट कर्नल के प्रति सहानुभूति रख सकते हैं, लेकिन पिता की आकांक्षा सेना में कमीशंड अधिकारी के चयन के मानकों को परिभाषित नहीं करता है।

आगे कहा कि उपलब्ध रिकॉर्ड से पता चलता है कि उम्मीदवार को आईएमए के रेजिमेंट और काफी अनुशासित जीवन शैली का अभ्यस्त बनने में कठिनाई हो रही थी। वह ट्रेनिंग में अनुपस्थित रहता था और बीमारी की बात कहकर अहम कार्यक्रमों में नहीं जाता था। झूठ बोलने की वजह से उसे कई बार दंडित किया गया और उसके खिलाफ ऑनर कोड कमेटी गठित हुई।

अदालत ने दी पिता को सलाह
दिल्ली हाईकोर्ट ने कहा, इससे पता चलता है कि लेफ्टिनेंट कर्नल का बेटा सेना की जीवनशैली के उपयुक्त नहीं है। संभवत: वह अपने पिता की इच्छा के कारण सेना में आया और उनकी आकांक्षाओं को पूरा करने के लिए संघर्षरत है।

लेफ्टिनेंट कर्नल को सलाह दी जाती है कि वह अपने बेटे को अपना जीवन मार्ग चुनने की आजादी दें और वह जो भी चुनता है, उसमें आगे बढ़े और निश्चित रूप से उसका विकल्प भारतीय सेना नहीं है।
 
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