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Congress: हिमाचल में कामयाब, गुजरात में नहीं बदला मिजाज, खरगे के नेतृत्व की चुनौती अगले साल

अनूप वाजपेयी, नई दिल्ली। Published by: देव कश्यप Updated Fri, 09 Dec 2022 05:31 AM IST
सार

कांग्रेस ने हिमाचल में लोगों की सत्ता विरोधी नाराजगी को भांपकर पुरानी पेंशन योजना जैसे आम लोगों से जुड़े मुद्दों को आगे रख चुनाव लड़ा। वहीं, गुजरात में 27 साल की सत्ता विरोधी लहर के बावजूद कांग्रेस वहां लोगों का मिजाज बदलने में नाकाम रही। यहां पिछले चुनाव के मुकाबले कांग्रेस का वोट बैंक 16 फीसदी कम हुआ तो 13 फीसदी वोट आप के खाते में गया...

हिमाचल में कांग्रेस का जश्न।
हिमाचल में कांग्रेस का जश्न। - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

कांग्रेस की जीत में रिवाज ने उसके पक्ष में माहौल जरूर बनाया, लेकिन कांग्रेस ने युवाओं के बीच बेरोजगारी, कर्मचारियों के बीच पुरानी पेंशन, किसानी और बागवानी जैसे मुद्दों से खुद को भटकने नहीं दिया। भाजपा सरकार के खिलाफ लोग बहुत नाराज हैं, इसलिए उन्हीं मुद्दों को हवा दी, जिसे लेकर नाराजगी थी। यही कारण है सरकार के छह मंत्री चुनाव हार गए हैं।

हिमाचल: गुटबाजी हावी नहीं होने दी
कांग्रेस के लिए हिमाचल चुनावी मॉडल साबित हो सकता है, जहां उम्मीदवारों के चयन से लेकर पूरे चुनाव तक नेता अलग-अलग गुट बंटे  जरूर दिखे लेकिन गुटबाजी सामने नहीं आई। उम्मीदवारों के चयन में आधे से अधिक ऐसे थे, जिन्हें लेकर सभी एकमत थे।



सीएम चेहरा घोषित न करने की नीति कामयाब
मुख्यमंत्री का चेहरा घोषित न करने की रणनीति भी अलग-अलग क्षत्रपों के क्षेत्र में पार्टी को कामयाबी दिलाने वाली रही। कांग्रेस को राज्य में भाजपा नेताओं की गुटबाजी का भी लाभ मिला है। हालांकि परिणाम आने के बाद मुख्यमंत्री तय करना कांग्रेस नेतृत्व के लिए चुनौती भरा रहेगा।

बेहतर प्रबंधन के साथ रण में उतरी कांग्रेस
हिमाचल में कांग्रेस की रणनीति और बेहतर चुनावी प्रबंधन को नकारा नहीं जा सकता है। कांग्रेस महासचिव प्रियंका गांधी के लिए भी हिमाचल की जीत मायने रखती है। पार्टी में सीधे तौर सक्रियता के बाद पहला मौका होगा जहां उनकी मौजूदगी में जीत दर्ज हुई।

खरगे के नेतृत्व की चुनौती अगले साल
कांग्रेस के नए अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे के नेतृत्व में पार्टी की एक राज्य में वापसी उन्हें आशान्वित करती है। खरगे ने राहुल गांधी से अधिक रैलियां गुजरात में की थीं। नतीजों को उनके नेतृत्व से जोड़ा जाएगा तो एक राज्य जीतने के साथ उनके हिस्से एक बड़ी हार भी आएगी। खरगे के नेतृत्व की असल परीक्षा अगले साल होगी। जब छत्तीसगढ़, राजस्थान सहित मध्यप्रदेश, कर्नाटक, तेलंगाना, त्रिपुरा, मेघालय, नागालैंड और मिजोरम में भी विधानसभा चुनाव होने हैं।  

गुजरात: कांग्रेस के लचर रवैये से भाजपा की जमीन मजबूत
गुजरात में 1995 से लेकर अब तक कांग्रेस इतनी बुरी तरह कभी पराजित नहीं हुई। 2017 में पार्टी को 77 सीटें दिलाने वाले अशोक गहलोत का जादू इस बार फेल रहा। जिस समय गुजरात में चुनाव चल रहा था, पड़ोसी राज्य राजस्थान में पार्टी आपस में भिड़ी रही। पार्टी ने गुजरात के जिन युवा नेताओं को जोड़कर भविष्य का ताना बाना बुना था, उन्होंने भी किनारा कर लिया। 2017 के बाद कांग्रेस ने भाजपा सरकार विरोधी गुजरातियों के दिलों में जो जगह बनाई थी धीरे-धीरे वहां आम आदमी पार्टी धड़कना शुरू कर दिया।

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  • राज्य में संगठन को लेकर पार्टी का लचर रवैया भी पार्टी के नुकसान का कारण बना है। जिन विधानसभा सीटों पर कांग्रेस पिछली बार जीती थी, वहां संगठनात्मक ढांचे को मजबूती नहीं दी गई और वो सीट खिसक गईं।
  • गुजरात में बुरी हार के लिए केंद्रीय नेतृत्व भी जिम्मेदार है। जिसने गुजरात चुनाव को कतई गंभीरता से नहीं लिया। भारत जोड़ो यात्रा के शुरुआत से पहले राहुल गांधी ने एक सभा की और फिर चुनाव के आखिर में गए।


भारत जोड़ो यात्रा की सफलता अगले साल तय होगी

  • भारत जोड़ो यात्रा में युवाओं को जोड़ने और बेरोजगारी के मुद्दे पर सरकार को घेरने का असर हिमाचल में दिखा है। यात्रा मध्यप्रदेश से राजस्थान में पहुंची है, जहां अगले साल चुनाव हैं। आने वाला साल राहुल और भारत जोड़ो यात्रा की कसौटी पर कसा जाएगा।
  • कांग्रेस दक्षिण के जिन राज्यों में यात्रा लेकर निकली है और जहां से उसने उम्मीद जोड़ी है उनमें कर्नाटक, तेलंगाना में चुनाव होने हैं। कांग्रेस यहां सरकार बना पाती है तब यात्रा को 2024 के लोकसभा चुनाव से जोड़कर देखना होगा।


विधायकों को एकजुट रखने पर नजर
हिमाचल प्रदेश में बहुमत से अधिक संख्या आने के बाद कांग्रेस सरकार बनाने में देर नहीं करना चाहती है। हिमाचल के प्रभारी राजीव शुक्ला ने नतीजे आने के बाद कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे से मुलाकात की। नेतृत्व चाहता है कि जल्द से जल्द विधायक दल की बैठक बुलाई जाए। वहीं पार्टी की ओर से दो पर्यवेक्षक छत्तीसगढ़ के सीएम भूपेश बघेल और हरियाणा के पूर्व मुख्यमंत्री भूपेंद्र सिंह हुड्डा को हिमाचल भेजा गया है। विधायकों को एक जगह रखने की रणनीति है। ताकि सरकार बनाने के दावे के समय सभी विधायक एक साथ हों।

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